अजनबी संग होटल मे चुदाई


होटल के उस आलीशान कमरे की मद्धम पीली रोशनी में एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी, जिसमें सिर्फ एयर कंडीशनर की हल्की सी घरघराहट सुनाई दे रही थी। विक्रम, जो शहर में एक बिजनेस मीटिंग के लिए आया था, बिस्तर पर टिका हुआ अपनी फाइलों में उलझा था, तभी कमरे के दरवाजे पर एक हल्की सी दस्तक हुई। जब उसने दरवाजा खोला, तो सामने खड़ी युवती को देखकर उसकी सांसें थम सी गईं। वह सोनल थी, जिसे होटल प्रबंधन की एक गलती की वजह से वही कमरा आवंटित कर दिया गया था। सोनल की उम्र लगभग 27 साल थी, और उसकी साड़ी में लिपटा बदन किसी गठीली सुराही की तरह था। उसके चेहरे पर फैली घबराहट और उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में तैरती मासूमियत ने विक्रम के दिल की धड़कनें बढ़ा दी थीं। रात के 10 बज चुके थे और होटल पूरी तरह से भरा हुआ था, जिस कारण सोनल के पास उसी कमरे में रुकने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा था।

सोनल का शरीर किसी शिल्पी की बेहतरीन कलाकृति जैसा था, जहाँ हर घुमाव एक नई कहानी कहता प्रतीत होता था। जब उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, तो विक्रम की नज़रें उसके साड़ी के नीचे दबे उन पुष्ट और रसीले तरबूजों पर जाकर टिक गईं, जो चोली के अंदर से बाहर आने को बेताब लग रहे थे। सोनल का पिछवाड़ा उसकी पतली कमर के साथ एक ऐसा कंट्रास्ट बना रहा था जो किसी भी पुरुष को पागल करने के लिए काफी था। वह जब धीरे-धीरे चलकर सोफे की ओर बढ़ी, तो उसके शरीर की लचक और उसके अंगों का उतार-चढ़ाव विक्रम के भीतर एक सोई हुई आग को सुलगाने लगा। विक्रम ने महसूस किया कि उसका खीरा अब अपनी नींद से जाग रहा है और उसकी पतलून के भीतर अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। सोनल ने भी शायद विक्रम की नज़रों की तपिश को महसूस कर लिया था, क्योंकि उसने नजरें नीची कर ली थीं और उसके गालों पर गुलाबी रंगत छा गई थी।

कमरे के भीतर बढ़ती उस खामोशी में एक अनकहा भावनात्मक जुड़ाव जन्म लेने लगा था। दोनों अजनबी थे, लेकिन उस रात की तन्हाई ने उन्हें एक-दूसरे के करीब ला दिया था। सोनल ने धीरे से अपनी सैंडल उतारी और बिस्तर के एक कोने पर बैठ गई, जिससे उसकी रेशमी जांघों का एक हिस्सा उजागर हो गया। विक्रम ने पास आकर उसे पानी का गिलास दिया, और जब उनकी उंगलियां आपस में टकराईं, तो एक बिजली सी दोनों के शरीर में दौड़ गई। वह पहला स्पर्श मात्र एक संयोग नहीं था, बल्कि उन दोनों की दबी हुई इच्छाओं का विस्फोट था। विक्रम ने देखा कि सोनल के उन रसीले तरबूजों पर स्थित नन्हे मटर के दाने अब साड़ी के पतले कपड़े को भेदकर बाहर की ओर झाँकने लगे थे, जो इस बात का सबूत थे कि सोनल भी उसी उत्तेजना को महसूस कर रही थी।

विक्रम के मन में एक द्वंद्व चल रहा था कि वह आगे बढ़े या नहीं, लेकिन सोनल की झुकती हुई पलकें और उसकी भारी होती सांसें उसे आमंत्रण दे रही थीं। उसने धीरे से अपना हाथ सोनल के कंधे पर रखा और उसे अपनी ओर खींचा। सोनल ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसने अपना सिर विक्रम के सीने पर टिका दिया। विक्रम ने उसके बालों की खुशबू को महसूस किया और धीरे-धीरे अपने हाथ को उसकी कमर की ओर ले गया। जैसे ही उसका हाथ सोनल की नंगी पीठ को छू गया, सोनल के मुंह से एक धीमी सी कराह निकली। विक्रम ने उसके साड़ी के पल्लू को धीरे से कंधे से सरका दिया, जिससे उसके वे विशाल तरबूज अब और भी ज्यादा स्पष्ट दिखाई देने लगे थे। मटर के दाने अब पूरी तरह से अकड़ चुके थे, और विक्रम ने बिना देर किए अपने होंठ सोनल के गर्दन पर रख दिए, जिससे वह पूरी तरह कांप उठी।

विक्रम की उंगलियां अब सोनल की चोली के हुक तक पहुँच चुकी थीं। जैसे ही उसने चोली खोली, सोनल के दोनों आज़ाद तरबूज उछलकर बाहर आ गए। वे इतने गोरे और सुडौल थे कि विक्रम उन्हें बस देखता रह गया। उसने एक तरबूज को अपने हाथ में लिया और उसे धीरे से दबाया, जिससे सोनल की सांसें और भी तेज हो गई। उसने अपनी जीभ से उन नन्हे मटरों को सहलाया, जिससे सोनल बिस्तर पर लोटपोट होने लगी। उसका हाथ खुद-ब-खुद विक्रम के पतलून तक गया और उसने वहाँ छिपे उस सख्त और गर्म खीरे को महसूस किया। सोनल ने कांपते हाथों से विक्रम की पतलून की जिप खोली और उस विशाल खीरे को बाहर निकाला। खीरे की लम्बाई और मोटाई देखकर सोनल की आँखों में एक चमक सी आ गई और उसने उसे अपने कोमल हाथों में थाम लिया।

सोनल अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी। उसने नीचे झुककर विक्रम के उस तने हुए खीरे को अपने मुँह में ले लिया। खीरा चूसना उसे जैसे बहुत पसंद आ रहा था, क्योंकि वह अपनी जीभ से उसके हर कोने को सहला रही थी। विक्रम को ऐसा सुख मिल रहा था जैसे वह स्वर्ग में हो। कुछ देर तक खीरा मुँह में लेने के बाद, सोनल ने विक्रम को अपनी ओर खींचा और अपनी साड़ी पूरी तरह से उतार दी। अब उसकी वह रहस्यमयी खाई विक्रम के सामने थी, जो घने और रेशमी बालों से ढकी हुई थी। उस खाई से एक प्राकृतिक खुशबू आ रही थी जो विक्रम को मदहोश कर रही थी। उसने अपनी उंगली से खाई को टटोलना शुरू किया, तो पाया कि वह खाई पूरी तरह से गीली और चिपचिपी हो चुकी थी, जो इस बात का संकेत थी कि खुदाई का समय आ चुका है।

विक्रम ने सोनल को बिस्तर के बीचों-बीच लिटाया और उसके दोनों पैरों को चौड़ा कर दिया। उसने अपने खीरे की नोक को उस गीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से दबाव बनाया। सोनल ने दर्द और सुख के मिले-जुले अहसास में अपनी आँखें जोर से बंद कर लीं। जैसे ही पूरा खीरा उस तंग खाई के भीतर समाया, सोनल ने विक्रम की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। खुदाई शुरू हो चुकी थी। सामने से खोदना (मिशनरी) उन दोनों के लिए बहुत ही सुखद था, क्योंकि वे एक-दूसरे की आँखों में देख पा रहे थे। विक्रम के हर धक्के के साथ सोनल के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके टकराने की आवाज कमरे में गूंज रही थी। सोनल बार-बार विक्रम को और जोर से खोदने के लिए कह रही थी, उसकी प्यास जैसे बुझने का नाम ही नहीं ले रही थी।

कुछ देर तक सामने से खोदने के बाद, विक्रम ने सोनल को पलट दिया और उसे घुटनों के बल खड़ा कर दिया। पिछवाड़े से खोदना (डॉगी स्टाइल) का मजा ही कुछ और था। इस स्थिति में विक्रम को सोनल के उस सुडौल पिछवाड़े का पूरा नजारा मिल रहा था। उसने पीछे से अपने खीरे को फिर से उस खाई में उतारा और तेज गति से प्रहार करने लगा। सोनल की आहें अब चीखों में बदल रही थीं, और उसका पूरा बदन पसीने से तर-बतर हो गया था। खुदाई इतनी गहन थी कि कमरे की हवा भी गर्म हो चुकी थी। विक्रम ने सोनल के कमर को कसकर पकड़ा और अपनी गति को चरम पर पहुँचा दिया। सोनल का शरीर थरथराने लगा था, उसकी खाई अब और भी ज्यादा रस छोड़ने लगी थी, जिससे खुदाई की आवाज़ और भी बढ़ गई थी।

अंततः, वह क्षण आ ही गया जब दोनों की बर्दाश्त खत्म होने लगी। विक्रम ने महसूस किया कि उसका खीरा अब फटने को तैयार है, और ठीक उसी समय सोनल का भी शरीर अकड़ने लगा। दोनों ने एक साथ जोर से चिल्लाते हुए अपना सारा रस छोड़ दिया। वह रस सोनल की खाई के भीतर और बाहर फैल गया, जिससे एक अजीब सा सुकून महसूस हुआ। विक्रम सोनल के ऊपर ही ढेर हो गया, दोनों की सांसें बेकाबू थीं और दिल की धड़कनें एक-दूसरे से मुकाबला कर रही थीं। खुदाई खत्म हो चुकी थी, लेकिन उस कमरे में जो अहसास पैदा हुआ था, वह ताउम्र रहने वाला था।

अगली सुबह जब सूरज की किरणें खिड़की से कमरे में दाखिल हुईं, तो सोनल और विक्रम एक-दूसरे की बाहों में बंधे हुए थे। उस रात की खुदाई ने दो अजनबियों के बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया था जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था। सोनल के चेहरे पर एक संतुष्टि भरी मुस्कान थी और विक्रम की आँखों में उसके लिए सम्मान। वे जानते थे कि शायद वे फिर कभी न मिलें, लेकिन वह रात, वह खाई, वह खीरा और वह बेतहाशा खुदाई उनके ज़हन में हमेशा के लिए कैद हो गई थी। बिस्तर की चादरों पर बिखरी हुई वह गंध और शरीर की वह थकान उन्हें बार-बार उस मधुर मिलन की याद दिला रही थी, जो सिर्फ जिस्मों का नहीं बल्कि रूहों का भी मिलन था।