गर्मी की उन तपती दोपहरियों में जब पूरा गाँव सन्नाटे की चादर ओढ़कर सो जाता था, तब घर के भीतर एक अलग ही किस्म की बेचैनी पनप रही थी। अमन अपनी छुट्टियों में अपनी सगी मामी सुनीता के घर रहने आया था, जो शहर की आपाधापी से दूर एक शांत कस्बे में था। सुनीता मामी की उम्र करीब पैंतीस साल थी, लेकिन उनके बदन की बनावट किसी बीस साल की नवयौवना को भी मात देती थी, जिसे देखकर अमन का मन अक्सर डोल जाता था। उनकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी जो अमन को अपनी ओर खींचती थी और उनके चलने के अंदाज में एक ऐसी लचक थी जो किसी के भी भीतर सोई हुई इच्छाओं को जगाने के लिए काफी थी।
अमन अक्सर छत पर बैठकर सुनीता मामी को आंगन में काम करते हुए देखता रहता था और उनके हर कदम पर नजर रखता था। सुनीता मामी का शरीर काफी भरा हुआ था, उनके रेशमी बालों के नीचे उनके दो विशाल और गोल-गोल तरबूज उनकी सूती साड़ी के भीतर से झाँकने की कोशिश करते थे। जब भी वह झुककर झाड़ू लगातीं या पानी भरतीं, तो साड़ी के पल्लू से उनके तरबूजों की गोलाई और उनके ऊपर उभरे हुए नन्हे मटर के दानों की छाप अमन की धड़कनों को तेज कर देती थी। वह उन तरबूजों को बस एक बार अपने हाथों में लेकर महसूस करना चाहता था, लेकिन रिश्तों की मर्यादा उसे हमेशा रोक लेती थी।
सुनीता मामी और अमन के बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव था, जो धीरे-धीरे एक अनकहे आकर्षण में तब्दील हो रहा था। अमन की नजरें अक्सर मामी के चौड़े और मांसल पिछवाड़े पर जाकर टिक जाती थीं, जो साड़ी में पूरी तरह से फिट होकर एक कमाल का उभार पैदा करता था। जब वह चलती थीं, तो उनका पिछवाड़ा इस तरह मटकता था कि अमन की साँसे फूलने लगती थीं और उसे महसूस होता था कि उसकी पतलून के भीतर उसका खीरा धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। वह अपनी नजरें छुपाने की कोशिश करता, लेकिन सुनीता मामी की कातिल बनावट उसे बार-बार अपनी ओर देखने को मजबूर कर देती थी।
एक दिन दोपहर के समय जब घर में कोई नहीं था और बिजली भी कटी हुई थी, उमस अपनी चरम सीमा पर थी। सुनीता मामी रसोई में पसीने से तर-बतर होकर खाना बना रही थीं और उनकी साड़ी उनके शरीर के अंगों से बुरी तरह चिपक गई थी। अमन प्यास के बहाने रसोई में गया और उसने देखा कि मामी का ब्लाउज पसीने की वजह से उनके पीठ और तरबूजों से पूरी तरह सट गया है। उस नजारे ने अमन के भीतर एक ऐसी आग जला दी जिसे बुझाना अब उसके बस में नहीं था, उसकी नजरें उनके भीगे हुए बदन पर जमी हुई थीं।
सुनीता मामी ने पीछे मुड़कर देखा तो अमन की आँखों में अपने लिए वो प्यास साफ देख ली, जिसे वह अब तक छुपाता आया था। उनके बीच एक लंबी खामोशी छा गई, सिर्फ उनकी तेज होती साँसों की आवाजें ही उस सन्नाटे को तोड़ रही थीं। अमन ने हिम्मत जुटाकर पानी का गिलास लेने के बहाने उनके पास कदम बढ़ाए और जैसे ही उनके हाथ आपस में छुए, एक बिजली सी दोनों के शरीर में दौड़ गई। मामी ने हाथ पीछे नहीं खींचा, बल्कि उनकी नजरों में एक ऐसी रजामंदी थी जिसने अमन की सारी झिझक को पल भर में राख कर दिया।
अमन ने धीरे से अपना हाथ मामी की कमर पर रखा, जहाँ से उनकी त्वचा रेशम की तरह मुलायम और पसीने के कारण चिकनी महसूस हो रही थी। उसने उन्हें धीरे से अपनी ओर खींचा और उनके कान के पास जाकर अपनी गरम साँसें छोड़ीं, जिससे मामी का पूरा बदन कांप उठा। सुनीता मामी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अमन के सीने पर अपना सिर टिका दिया, मानो वह भी इस पल का अरसों से इंतजार कर रही थीं। अमन के हाथों ने धीरे-धीरे ऊपर बढ़ते हुए उनके भारी तरबूजों को साड़ी के ऊपर से ही सहलाना शुरू कर दिया।
जैसे ही अमन की उँगलियाँ उनके तरबूजों के बीच दबे उन मटर के दानों तक पहुँचीं, मामी के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली। वह उन मटर के दानों को अपनी उँगलियों के बीच रगड़ने लगा, जिससे मामी की कामुकता अपनी चरम सीमा पर पहुँचने लगी। अमन ने बिना देर किए अपनी मामी के होंठों को अपने काबू में लिया और उन्हें बड़ी शिद्दत से चूमने लगा, मानो वह उनका सारा रस पी जाना चाहता हो। उनकी जुबानें एक-दूसरे से टकरा रही थीं और उनके बदन की गर्मी अब असहनीय होती जा रही थी।
धीरे-धीरे अमन ने उनके ब्लाउज के हुक खोल दिए और उनके उन दो विशाल और दूधिया तरबूजों को आजाद कर दिया, जो अब अमन के सामने अपनी पूरी खूबसूरती के साथ मौजूद थे। अमन ने झुककर एक तरबूज को अपने मुँह में भर लिया और उसके ऊपर लगे मटर को अपनी जुबान से सहलाने लगा। मामी ने उसके बालों को कसकर पकड़ लिया और उनकी कराहें रसोई की दीवारों से टकराने लगीं। उनका बदन बुरी तरह से धनुष की तरह मुड़ने लगा था और उनकी साँसें बहुत तेज हो चुकी थीं।
अमन के हाथों ने अब धीरे-धीरे नीचे का रुख किया और साड़ी को उनके बदन से पूरी तरह अलग कर दिया। अब सुनीता मामी पूरी तरह से प्राकृतिक रूप में उसके सामने थीं, उनकी गहरी और नम खाई अमन को अपनी ओर पुकार रही थी। उस खाई के आसपास उगे हुए काले और रेशमी बाल उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रहे थे। अमन ने अपनी उँगलियों को उनकी उस गीली खाई के करीब पहुँचाया और उसे महसूस किया, जो पहले से ही अपने रस से पूरी तरह भीग चुकी थी।
अमन ने अपनी उंगली को उनकी खाई के भीतर धीरे से उतारा, जिससे मामी का पूरा शरीर एक झटके के साथ हवा में उछल गया। वह अपनी उंगली से उनकी खाई में खुदाई करने लगा, जिससे निकलने वाली आवाजें उस कमरे में एक अजीब सा संगीत पैदा कर रही थीं। मामी की आँखों में अब सिर्फ हवस और जुनून था, उन्होंने अमन के हाथ को पकड़कर उसे अपने खीरे की याद दिलाई। अमन ने बिना देरी किए अपनी पतलून उतारी और उसका सख्त और लंबा खीरा अब पूरी तरह से तैयार होकर बाहर आ गया था।
सुनीता मामी ने अमन के उस खीरे को अपने कोमल हाथों में पकड़ा और उसे बड़ी हैरानी से देखने लगीं, उसकी लंबाई और मोटाई देखकर उनकी आँखें फटी की फटी रह गई थीं। उन्होंने झुककर उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़ी ही शिद्दत के साथ चूसने लगीं, जिससे अमन की आँखों के सामने सितारे नाचने लगे। खीरे के ऊपर उनकी जीभ का स्पर्श अमन को पागल कर रहा था, और उसका रस धीरे-धीरे उनकी जुबान पर फैलने लगा था।
अब सब्र का बांध पूरी तरह टूट चुका था, अमन ने मामी को रसोई के स्लैब पर लेटा दिया और उनकी टाँगों को चौड़ा करके उनके बीच अपनी जगह बनाई। उसने अपने खीरे की नोक को उनकी गीली और तड़पती हुई खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से भीतर धकेलना शुरू किया। जैसे ही खीरा उनकी तंग खाई के भीतर गया, मामी के चेहरे पर दर्द और आनंद का एक मिला-जुला भाव उभर आया। उन्होंने अपनी टाँगें अमन की कमर के चारों ओर कस लीं और उसे अपनी ओर और गहराई तक खींचने लगीं।
अमन अब पूरी ताकत के साथ उनकी खाई में खुदाई करने लगा था, हर धक्के के साथ उसका खीरा उनकी गहराई को नाप रहा था। कमरे में सिर्फ उनके शरीरों के टकराने की और मामी की मदहोश कर देने वाली कराहों की आवाजें आ रही थीं। अमन ने उन्हें सामने से खोदना (मिशनरी) जारी रखा और उनके तरबूजों को अपने हाथों से बुरी तरह मसल रहा था। सुनीता मामी अपनी दोनों हथेलियों से स्लैब को कसकर पकड़े हुए थीं और हर वार पर अपना पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठाती थीं ताकि अमन का खीरा और गहराई तक जा सके।
करीब आधे घंटे की उस भीषण खुदाई के बाद अमन ने अपनी स्थिति बदली और मामी को उनके घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह उनके पिछवाड़े से खुदाई करने के लिए तैयार था। मामी का भारी पिछवाड़ा पीछे की ओर निकला हुआ था और उनकी खाई अब पीछे से पूरी तरह खुली हुई थी। अमन ने अपने खीरे को फिर से उनकी खाई के भीतर उतारा और तेज रफ्तार से धक्के लगाने शुरू किए। इस पोजीशन में अमन का खीरा उनकी खाई की दीवारों को बुरी तरह रगड़ रहा था, जिससे मामी पागलों की तरह चिल्लाने लगी थीं।
अमन की खुदाई की रफ्तार अब बहुत बढ़ चुकी थी, पसीना उनके शरीरों से टपककर फर्श पर गिर रहा था। सुनीता मामी की खाई अब पूरी तरह से लाल हो चुकी थी और वह अपनी तृप्ति के करीब पहुँच रही थीं। अमन ने उनके बालों को पीछे से पकड़ा और अपनी खुदाई को और भी ज्यादा हिंसक बना दिया। वह बस खोदे जा रहा था, मानो उस जमीन से कोई अनमोल खजाना निकाल लेना चाहता हो। मामी का बदन अब बुरी तरह कांपने लगा था और उनकी आँखें ऊपर की ओर चढ़ने लगी थीं।
अचानक, सुनीता मामी के शरीर में एक तेज कंपन उठा और उनकी खाई से भारी मात्रा में रस छूटने लगा। उसी समय अमन का खीरा भी अपने रस को रोकने में नाकाम रहा और उसने अपना सारा गर्म रस उनकी खाई की गहराई में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए उसी अवस्था में फर्श पर गिर पड़े, उनकी साँसें बहुत तेज चल रही थीं और उनके शरीर पूरी तरह से पसीने और रस से तर-बतर थे। वह पल एक अजीब सी शांति और सुकून लेकर आया था, जिसने उन दोनों के बीच के सारे तनाव को खत्म कर दिया था।
थोड़ी देर बाद जब दोनों की धड़कनें सामान्य हुईं, तो सुनीता मामी ने अमन को अपने सीने से लगा लिया। उनके उन नरम तरबूजों के बीच अमन का चेहरा छिपा हुआ था और उसे एक ऐसी राहत महसूस हो रही थी जो उसे पहले कभी नहीं मिली थी। वह दोनों उसी हाल में बिना किसी शर्म के लेटे रहे, अपनी उस अधूरी प्यास के बुझने का जश्न मनाते हुए। रिश्तों की वो दीवार आज पूरी तरह से ढह चुकी थी और उसकी जगह एक नई और गहरी जिस्मानी और रूहानी डोर ने ले ली थी।
बाहर सूरज अब ढलने लगा था और शाम की ठंडी हवा खिड़की से कमरे के भीतर आ रही थी, जो उनके तपते हुए शरीरों को ठंडक पहुँचा रही थी। अमन ने मामी के माथे को चूमा और उनके चेहरे पर फैली उस मुस्कान को देखा जो उनकी संतुष्टि की गवाही दे रही थी। वह जानते थे कि यह सिलसिला अब रुकने वाला नहीं है, बल्कि यह तो उस लंबी और गहरी दास्तान की बस एक शुरुआत थी जिसे उन्हें बार-बार दोहराना था। उस दिन के बाद से, वह घर सिर्फ एक मकान नहीं, बल्कि उनकी अनकही और अदृश्य खुशियों का एक ऐसा कोना बन गया जहाँ सिर्फ खुदाई का राज था।
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