समीर अपने ऑफिस के काम से एक ठंडे पहाड़ी इलाके के आलीशान होटल में रुका हुआ था। शाम का वक्त था और धुंध चारों तरफ फैली हुई थी, लेकिन बारिश का नामोनिशान नहीं था। समीर अपनी बालकनी में खड़ा होकर नीचे की रोशनियों को देख रहा था, तभी उसकी नजर बगल वाली बालकनी में खड़ी एक औरत पर पड़ी। उसने गहरे लाल रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी जो उसके शरीर के हर मोड़ को उभार रही थी।
उस औरत का नाम नियति था, जैसा कि बाद में समीर को पता चला। नियति की उम्र करीब 30 के आसपास रही होगी, लेकिन उसकी शारीरिक बनावट किसी कम उम्र की लड़की को भी मात दे रही थी। उसके कंधों से फिसलती साड़ी और उसके गले का हार समीर का ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे। समीर ने धीरे से नमस्ते किया, जिसके जवाब में नियति ने एक धीमी और नशीली मुस्कान दी।
नियति का बदन भरा हुआ था, उसके कंधे चौड़े और गर्दन लंबी थी। समीर की नजरें उसके साड़ी के ब्लाउज से बाहर झाँकते हुए उन दो बड़े और सख्त तरबूजों पर टिक गईं जो सांस लेने के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। समीर को अपनी धड़कनें तेज होती महसूस हुईं, क्योंकि नियति भी उसकी नजरों को भांप रही थी और उसने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और खिसका दिया था।
समीर और नियति के बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे गहरा होता गया। नियति ने बताया कि वह यहाँ अपनी बोरियत दूर करने आई है। समीर ने गौर किया कि नियति की आँखों में एक प्यास थी, एक ऐसी तलाश जो शायद उसे भी महसूस हो रही थी। दोनों की नजरें जब टकरातीं, तो एक अनकही बिजली सी दौड़ जाती और समीर अपना चेहरा घुमा लेता।
होटल की लॉबी में जब वे दोबारा मिले, तो समीर ने उसे अपने कमरे में ड्रिंक के लिए आमंत्रित किया। नियति ने बिना किसी झिझक के हाँ कह दिया, जिससे समीर का दिल जोर से धड़कने लगा। कमरे में पहुँचते ही माहौल बदल गया। धीमी रोशनी और कमरे की शांति ने उनके बीच के आकर्षण को और अधिक बढ़ा दिया। नियति सोफे पर इस तरह बैठी कि उसका पिछवाड़ा पूरी तरह उभर कर सामने आ रहा था।
समीर ने नियति को ग्लास थमाया, तो उनकी उंगलियां एक-दूसरे से छू गईं। वह स्पर्श किसी करंट की तरह था, जिसने दोनों के जिस्म में एक सिहरन पैदा कर दी। समीर ने देखा कि नियति की सांसें तेज हो रही थीं और उसके तरबूजों के बीच का गहरा फासला पसीने की नन्ही बूंदों से चमक रहा था। झिझक अभी भी थी, पर मन का संघर्ष अब हारने लगा था।
समीर धीरे से उसके पास बैठा और उसकी रेशमी साड़ी पर अपना हाथ रखा। नियति ने अपनी आँखें मूंद लीं और एक गहरी आह भरी। समीर ने महसूस किया कि उसका बदन तप रहा था। उसने नियति के कान के पास झुककर अपनी गर्म सांसें छोड़ीं, जिससे नियति का पूरा शरीर कांप उठा। उसने समीर का हाथ पकड़कर उसे अपनी कमर के घेरे पर और जोर से दबा लिया।
पहला स्पर्श अब धीरे-धीरे एक तीव्र चाहत में बदलने लगा था। समीर ने नियति के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होठों के करीब गया। नियति ने अपनी गर्दन पीछे झुका दी, जिससे उसके गले की नसों का उभार साफ दिखने लगा। समीर ने अपनी जुबान से उसकी गर्दन को छुआ, जिससे नियति के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली सिसकारी निकली जो कमरे की खामोशी को चीर गई।
समीर के हाथ अब नियति के साड़ी के ब्लाउज के हुक तक पहुँच चुके थे। जैसे ही उसने पहला हुक खोला, नियति के उन रेशमी और भारी तरबूजों का ऊपरी हिस्सा आजाद होकर बाहर आने लगा। समीर ने देखा कि उनके ऊपर छोटे-छोटे मटर की तरह दाने उभरे हुए थे, जो ठंड और उत्तेजना की वजह से सख्त हो गए थे। समीर ने अपनी उंगलियों से उन मटरों को सहलाया, जिससे नियति बेहाल हो गई।
जैसे ही साड़ी का पल्लू जमीन पर गिरा, नियति का सुडौल शरीर समीर की आँखों के सामने था। उसका पिछवाड़ा इतना भारी और मांसल था कि समीर की उंगलियां उसमें धंस रही थीं। नियति ने भी समीर के कपड़े उतारने शुरू कर दिए। जब समीर का कड़क और लंबा खीरा नियति के सामने आया, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक और डर का मिश्रण दिखा, जो जल्द ही आकर्षण में बदल गया।
समीर ने नियति को बिस्तर पर लिटाया और उसके पैरों के बीच की उस गहरी खाई को निहारने लगा। वह खाई गुलाबी और नम थी, जहाँ से एक भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। समीर ने अपनी जुबान से उस खाई को चाटना शुरू किया, तो नियति ने बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच लिया। वह अपने कूल्हों को हवा में उठाकर समीर के मुँह पर दबाने लगी, मानो वह उस रस को पूरी तरह चखवाना चाहती हो।
नियति की खाई अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी और वह बार-बार 'ओह समीर' पुकार रही थी। समीर ने अपने हाथ की उंगली उस खाई में डाली, तो नियति ने एक जोरदार झटका लिया। वह खाई इतनी तंग थी कि समीर को अपना खीरा अंदर डालने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ने वाली थी। उसने धीरे-धीरे अपने खीरे की नोक को उस खाई के मुहाने पर रखा और दबाव बनाया।
जैसे ही खीरे का सिर उस खाई के अंदर गया, नियति की आँखों से आंसू निकल आए, पर वे दर्द के नहीं बल्कि चरम सुख की शुरुआत के थे। समीर ने उसे चूमते हुए दिलासा दिया और फिर एक गहरा धक्का मारा। पूरा खीरा उस तंग खाई के अंदर समा गया। नियति ने समीर को अपनी टांगों से जकड़ लिया और उसके पिछवाड़े पर अपने नाखून गड़ा दिए। कमरे में सिर्फ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज गूंज रही थी।
अब खुदाई की रफ्तार धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। समीर हर धक्के के साथ नियति की गहराई को नाप रहा था। नियति के तरबूज जोर-जोर से उछल रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों में भरकर जोर से मसल रहा था। वह कभी सामने से खोदता तो कभी उसे पलटकर उसके भारी पिछवाड़े से खोदना शुरू कर देता। नियति के मुँह से निकलने वाली आवाजें अब चीखों में बदल रही थीं, क्योंकि उसे वह सुख मिल रहा था जिसकी उसे बरसों से तलाश थी।
समीर ने नियति को डॉगी स्टाइल में किया और उसके पिछवाड़े के हिस्से को पकड़कर जोर-जोर से खुदाई करने लगा। नियति का बदन पसीने से तरबतर था और उसकी सांसें उखड़ रही थीं। हर धक्के पर उसका पूरा शरीर आगे की ओर झुक जाता और फिर वापस समीर के खीरे से टकराता। वह खुदाई इतनी गहरी और जोशीली थी कि कमरे की दीवारें भी मानो उस गर्मी को महसूस कर रही थीं।
करीब आधे घंटे की इस कड़ी खुदाई के बाद, समीर को महसूस हुआ कि अब उसका रस छूटने वाला है। नियति भी अपने चरम पर थी और उसका शरीर थरथराने लगा था। समीर ने अपनी गति और तेज कर दी और अंतिम कुछ धक्कों के साथ अपना सारा गर्म रस नियति की उस गहरी खाई के अंदर उड़ेल दिया। नियति ने एक लंबी और सुकून भरी आह भरी और समीर के ऊपर ही ढह गई।
खुदाई खत्म होने के बाद दोनों काफी देर तक एक-दूसरे की बाहों में लिपटे रहे। कमरे में चारों तरफ पसीने और मिलन की गंध फैली हुई थी। नियति का चेहरा अब शांत था और उसकी आँखों में एक अजीब सा सुकून था। समीर ने उसके माथे को चूमा और उसे अपनी छाती से लगा लिया। वह रात उन दोनों के लिए सिर्फ शारीरिक मिलन नहीं, बल्कि दो अजनबी रूहों के एक होने की दास्तां बन गई थी।
बाहर धुंध अभी भी छाई हुई थी, लेकिन कमरे के अंदर की आग अब शांत हो चुकी थी। नियति ने समीर की तरफ देखते हुए धीरे से कहा, "मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक अजनबी के साथ मुझे ऐसा अहसास होगा।" समीर ने बस मुस्कुराकर उसे और करीब खींच लिया। उस रात की वह खुदाई उन दोनों की यादों में हमेशा के लिए दफन हो गई, एक ऐसी याद जिसे वे शायद ही कभी भूल पाएंगे।
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