दोपहर का सूरज अपनी पूरी तपिश बिखेर रहा था और शहर की गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था। मैं पिछले तीन दिनों से रेखा मौसी के घर पर रुका हुआ था क्योंकि कॉलेज की छुट्टियां थीं। रेखा मौसी, जिनकी उम्र करीब 38 साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट को देखकर कोई भी उन्हें इस उम्र का नहीं कह सकता था। उनके शरीर का हर अंग जैसे जवानी के सांचे में ढला हुआ था और उनकी बनावट किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी थी। उनके पास बड़े और रसीले तरबूज थे जो साड़ी के ब्लाउज से बाहर झांकने को बेताब रहते थे।
रेखा मौसी का कद सामान्य था, लेकिन उनके शरीर का निचला हिस्सा यानी उनका पिछवाड़ा काफी भारी और मांसल था। जब वह चलती थीं, तो उनका वह हिस्सा एक अलग ही लय में डोलता था जिसे देखकर मेरा मन विचलित हो जाता था। उनके चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान रहती थी, जो उनकी गहरी और नशीली आंखों के साथ मिलकर एक अजीब सा जादू पैदा करती थी। हम दोनों के बीच हमेशा से एक प्यारा सा रिश्ता रहा था, लेकिन इस बार कुछ अलग महसूस हो रहा था।
मेरी उम्र 22 साल थी और जवानी की दहलीज पर खड़े होने के कारण मेरे अंदर की इच्छाएं उफान मार रही थीं। मौसी के प्रति मेरा आकर्षण केवल शारीरिक नहीं था, बल्कि उनके ममतामयी स्वभाव ने भी मुझे उनकी ओर खींचा था। लेकिन जब भी मैं उन्हें रसोई में काम करते हुए देखता, उनकी साड़ी का पल्लू कंधों से सरका हुआ होता, तो मेरा ध्यान उनके उन उभरे हुए तरबूजों पर टिक जाता था। उनके गोरे बदन पर पसीने की बूंदें चमकती थीं, जो उनके ब्लाउज के भीतर समा जाती थीं।
उस दिन घर में कोई नहीं था, मौसा जी शहर से बाहर किसी काम से गए हुए थे। दोपहर का समय था और भारी गर्मी की वजह से पूरा घर शांत था। मैं हॉल में बैठा टीवी देख रहा था, लेकिन मेरा सारा ध्यान रसोई में काम कर रही मौसी की तरफ था। वह वहां कुछ सफाई कर रही थीं और बार-बार झुकने की वजह से उनका पिछवाड़ा साड़ी के कपड़े को तान देता था। वह दृश्य इतना कामुक था कि मेरे शरीर में एक अजीब सी हलचल होने लगी थी।
मौसी ने हल्के नीले रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जो उनके शरीर से इस तरह चिपकी हुई थी कि उनके बदन का एक-एक उभार साफ नजर आ रहा था। वह जब भी ऊपर रखे डिब्बे उतारने के लिए हाथ उठातीं, उनकी कमर का गोरा हिस्सा और नाभि की गहराई पूरी तरह से उजागर हो जाती थी। मेरी निगाहें उनके उस बदन को प्यासी नजरों से निहार रही थीं और मेरा मन बार-बार झिझक और चाहत के बीच झूल रहा था।
अचानक मौसी ने पीछे मुड़कर देखा और हमारी नजरें मिल गईं। मैंने तुरंत नजरें झुका लीं, लेकिन मुझे महसूस हुआ कि उन्होंने मेरी चोरी पकड़ी ली है। उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी लाली छा गई थी। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और मुस्कुराते हुए मेरे पास आईं। "आर्यन, बहुत गर्मी है ना? जाओ, थोड़ा आराम कर लो," उन्होंने धीमे स्वर में कहा, लेकिन उनकी आवाज में एक थरथराहट थी।
मैं उठकर अपने कमरे में चला गया, लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी। कुछ देर बाद मौसी कमरे में आईं, उनके हाथ में पानी का गिलास था। कमरे में सन्नाटा था और केवल कूलर की आवाज गूंज रही थी। उन्होंने गिलास मेज पर रखा और मेरे बिस्तर के पास बैठ गईं। "क्या हुआ आर्यन, तुम आज बहुत शांत लग रहे हो?" उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखते हुए पूछा। उनके हाथ का स्पर्श बिजली के करंट की तरह मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया।
मैंने उनकी आंखों में देखा, वहां एक अजीब सी तड़प और गहरा राज छिपा था। मेरा हाथ अनायास ही उनकी कलाई पर चला गया। मौसी ने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि उनकी सांसें तेज होने लगीं। उनके भारी तरबूज उनकी तेज सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। कमरे की हवा में एक भारीपन सा छा गया था। हमारी धड़कनें एक-दूसरे को सुनाई दे रही थीं। यह वह पल था जब शब्दों की जरूरत खत्म हो गई थी और भावनाओं ने जगह ले ली थी।
मौसी की आंखों में एक संघर्ष था—समाज और मर्यादा का संघर्ष, लेकिन दूसरी तरफ उनकी दबी हुई इच्छाएं थीं जो बाहर आने को छटपटा रही थीं। मैंने धीरे से उनका हाथ अपने गाल पर रखा। उन्होंने अपनी उंगलियां मेरे होठों पर फेरीं और फिर अचानक उन्होंने मुझे गले लगा लिया। उनके उन नरम तरबूजों का दबाव मेरे सीने पर महसूस हुआ, जिससे मेरे शरीर में सिहरन पैदा हो गई। हमारा पहला स्पर्श इतना गहरा था कि सब कुछ थम सा गया।
मौसी ने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा, "आर्यन, यह गलत है..." लेकिन उनके शब्द उनकी हरकतों का साथ नहीं दे रहे थे। उन्होंने मुझे और जोर से भींच लिया। मैंने उनके चेहरे को अपने हाथों में लिया और उनके माथे को चूमा। उनके शरीर से सौंधी सी खुशबू आ रही थी, जिसमें पसीने की हल्की महक मिली हुई थी। मेरी हिम्मत बढ़ी और मैंने उनके ब्लाउज के पास अपने हाथ रखे। उनके बदन में एक कंपकंपी उठी, जो मेरी हथेलियों तक महसूस हुई।
मैंने धीरे-धीरे उनकी साड़ी की परतों को खोलना शुरू किया। मौसी ने अपनी आंखें बंद कर ली थीं, जैसे वह इस पल को पूरी तरह महसूस करना चाहती हों। जैसे ही साड़ी उनके बदन से नीचे गिरी, उनका वो अद्भुत शरीर मेरे सामने था। वह केवल ब्लाउज और पेटीकोट में थीं। उनके गोरे कंधों पर ब्लाउज की डोरी धंसी हुई थी। मैंने उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले, और जैसे ही वह खुला, उनके विशाल तरबूज आजाद होकर बाहर आ गए।
वे तरबूज इतने सफेद और बड़े थे कि उन्हें देखकर मेरी सांसें अटक गईं। उनके बीच के मटर जैसे हिस्से सख्त हो गए थे। मैंने अपनी जीभ से उन मटरों को सहलाया, जिससे मौसी के मुंह से एक दबी हुई आह निकली। वह अपना सिर पीछे की ओर झुकाकर बेड पर लेट गईं। उनकी कमर का लचीलापन और नाभि के पास की गोलाई बहुत ही आकर्षक थी। मैंने अपने कपड़े उतारे और मेरा खीरा पूरी तरह से तनाव में आकर खड़ा हो गया था।
मौसी की नजरें जब मेरे उस कड़क खीरे पर पड़ीं, तो उनकी आंखों में चमक आ गई। उन्होंने अपना हाथ बढ़ाकर उस खीरे को थाम लिया। उनकी नरम उंगलियों का स्पर्श पाकर खीरा और भी सख्त हो गया। उन्होंने धीरे-धीरे उसे सहलाया और फिर उसे अपने मुंह की गहराई में लेने की कोशिश की। उनके गरम मुंह के अंदर खीरा जाते ही मुझे जन्नत का अहसास हुआ। उनकी जीभ की लज्जत और लार ने उस खीरे को पूरी तरह से भिगो दिया था।
अब बारी मौसी की उस गुप्त खाई की थी। मैंने उनके पेटीकोट की डोरी खींची और वह भी उनके पैरों के पास ढेर हो गया। उनकी रेशमी खाई अब मेरे सामने थी, जिसके चारों ओर थोड़े बहुत बाल थे। वहां से एक प्राकृतिक गंध आ रही थी जो मुझे और भी उत्तेजित कर रही थी। मैंने अपना चेहरा उनकी उस खाई में दे मारा और उसे चाटना शुरू किया। मौसी अपना पिछवाड़ा हवा में उछालने लगीं और मेरे बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया।
मेरी जीभ जब उनकी खाई की गहराई में जा रही थी, तो मौसी बेकाबू हो रही थीं। वहां से निकलने वाला रस अब मेरे चेहरे पर लग रहा था। कुछ ही देर में मौसी का रस छूटने लगा और वह पूरी तरह से निढाल हो गई। लेकिन मेरा खीरा अभी भी अपनी मंजिल की तलाश में था। मैंने उन्हें सीधा लेटाया और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। उनकी खाई पूरी तरह से खुली हुई और गीली थी, जो मेरे खीरे का स्वागत करने के लिए तैयार थी।
मैंने धीरे से अपने खीरे की नोक को उनकी खाई के मुहाने पर रखा। मौसी ने अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं और मेरे हाथों को जोर से पकड़ लिया। जैसे ही मैंने एक धक्का दिया, मेरा आधा खीरा उनकी तंग खाई के भीतर समा गया। मौसी के मुंह से एक लंबी सिसकारी निकली, "आह्ह्ह आर्यन... धीरे..." मैंने थोड़ी देर रुक कर उन्हें सहज होने दिया और फिर धीरे-धीरे खुदाई शुरू की। हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी गहराई को नाप रहा था।
जैसे-जैसे खुदाई की गति बढ़ी, कमरे में केवल मांस के टकराने की आवाजें और हमारी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं। मौसी के तरबूज बुरी तरह से हिल रहे थे, जिन्हें मैंने अपने हाथों में भर लिया था। उनकी खाई की गर्मी और कसाव इतना जबरदस्त था कि मुझे लग रहा था मैं अभी हार मान जाऊंगा। लेकिन मौसी भी अब पूरी लय में आ चुकी थीं, वह नीचे से अपने पिछवाड़े को ऊपर की तरफ झटका दे रही थीं ताकि मेरा खीरा और अंदर तक जा सके।
खुदाई का यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। हमने अपनी जगह बदली और मैंने उन्हें पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। वह बिस्तर पर घुटनों के बल झुकी हुई थीं और उनका भारी पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठा हुआ था। पीछे से उनकी खाई और भी ज्यादा तंग महसूस हो रही थी। मैंने अपनी पूरी ताकत से खुदाई जारी रखी। मौसी के पसीने से भीगे बदन की चमक और उनके हिलते हुए तरबूज मुझे और भी जोश दिला रहे थे।
अंत में, जब हम दोनों अपनी चरम सीमा पर थे, मैंने अपनी गति को और तेज कर दिया। मौसी जोर-जोर से मेरा नाम पुकार रही थीं। अचानक मेरा शरीर अकड़ गया और मैंने अपना सारा गरम रस उनकी खाई की गहराई में छोड़ दिया। उसी समय मौसी का भी रस छूट गया और वह धप से बिस्तर पर गिर पड़ीं। हम दोनों पसीने में लथपथ थे और हमारी सांसें एक-दूसरे के चेहरे पर टकरा रही थीं। वह सुकून जो उस पल मिला, वह शब्दों से परे था।
कुछ देर बाद हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए थे। मौसी का चेहरा अभी भी लाल था और उनकी आंखों में एक अजीब सी तृप्ति थी। उन्होंने धीरे से मेरे गालों को चूमा और कहा, "तुमने मुझे आज जो महसूस कराया है, वह मैंने सालों से नहीं पाया था।" हम दोनों के बीच का वह डर और झिझक अब खत्म हो चुकी थी, लेकिन एक नया एहसास जन्म ले चुका था। वह दोपहर मौसी की खुदाई के उस अटूट लम्हे के साथ हमारे दिलों में हमेशा के लिए दर्ज हो गई।
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