पड़ोसी भाभी की चु@@ई ---> दोपहर का वक्त था और सूरज अपनी पूरी तपिश के साथ आसमान से आग बरसा रहा था, जिसकी वजह से गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था। मैं अपने कमरे में लेटा हुआ खिड़की से बाहर देख रहा था, जहाँ सामने वाली छत पर सुनीता भाभी गीले कपड़े सुखा रही थीं। सुनीता भाभी की उम्र लगभग 32 साल रही होगी, लेकिन उनका शरीर किसी 20 साल की जवान लड़की की तरह कसा हुआ और सुडौल था। उनकी साड़ी का पल्लू हवा में बार-बार लहरा रहा था, जिससे उनके शरीर के उभार साफ नजर आ रहे थे। उनके भारी और गोल-मटोल तरबूज ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे, और हर बार जब वह हाथ ऊपर उठाती थीं, तो उनकी पतली कमर का लचीलापन मेरे मन में अजीब सी हलचल पैदा कर देता था।
सुनीता भाभी का रंग निखरा हुआ गेहूंआ था और उनकी आँखें हमेशा एक गहरी प्यास को बयान करती थीं, जिसे शायद उनके पति कभी समझ ही नहीं पाए। उनके शरीर की बनावट कुछ ऐसी थी कि कोई भी उन्हें देखकर मदहोश हो जाए, उनके भारी और चौड़े पिछवाड़े साड़ी के नीचे से साफ़ अपनी गोलाई का अहसास कराते थे। मैं अक्सर उन्हें छुप-छुप कर देखा करता था, और मेरे मन में हमेशा यह ख्याल आता था कि क्या कभी मुझे उन रेशमी बदन को छूने का मौका मिलेगा। उनकी कमर पर पड़ने वाले बल और नाभि की गहराई किसी को भी अपने मोहपाश में बांधने के लिए काफी थी। उस दिन गर्मी कुछ ज्यादा ही थी और भाभी के माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं, जो उनके चेहरे की चमक को और बढ़ा रही थीं।
हम दोनों के बीच पिछले कुछ महीनों से एक अनकहा सा रिश्ता पनप रहा था, जो सिर्फ नज़रों की गुस्ताखियों तक सीमित था। कभी-कभी जब हम आमने-सामने होते, तो वह अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करने लगती थीं, जो मेरे लिए एक मूक आमंत्रण की तरह होता था। उनके व्यवहार में एक अजीब सी झिझक भी थी और एक बेपनाह आकर्षण भी, जो उन्हें मेरी ओर खींच रहा था। हमारे बीच एक भावनात्मक जुड़ाव बन चुका था क्योंकि उनके पति काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहते थे और वह घर में बिल्कुल अकेली होती थीं। मैंने कई बार उनकी छोटी-मोटी मदद की थी, जिससे हमारे बीच की दूरी धीरे-धीरे कम होने लगी थी और बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया था।
उस दोपहर जब भाभी कपड़े सुखाकर नीचे आईं, तो उन्होंने मुझे अपनी बालकनी से इशारा किया कि मैं उनके घर आऊं क्योंकि उनके घर का पंखा कुछ खराब हो गया था। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा क्योंकि मैं जानता था कि घर में कोई नहीं है और यह मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। जब मैं उनके घर पहुँचा, तो उन्होंने दरवाजा खोला और एक ठंडी मुस्कान के साथ मेरा स्वागत किया। उनके बदन से साफ़ साबुन और पसीने की एक मिली-जुली कामुक खुशबू आ रही थी, जिसने मेरे दिमाग को सुन्न कर दिया था। भाभी ने एक बहुत ही पतली और झीनी साड़ी पहनी हुई थी, जिसके अंदर से उनके गुलाबी मटर साफ़ झलक रहे थे, जो शायद गर्मी या उत्तेजना की वजह से थोड़े सख्त हो गए थे।
पंखा ठीक करने के बहाने जब मैं स्टूल पर चढ़ा, तो भाभी नीचे खड़ी होकर स्टूल को पकड़े हुए थीं। मेरी नज़र बार-बार उनके खुले गले से अंदर झांक रही थी, जहाँ उनके विशाल तरबूज आपस में दबे हुए एक गहरी घाटी बना रहे थे। मेरा खीरा पैंट के अंदर ही अपनी लम्बाई और मोटाई दिखाने लगा था और उसमें एक अजीब सी टीस उठ रही थी। अचानक मेरा पैर फिसला और मैं सीधे भाभी के ऊपर जा गिरा, जिससे हम दोनों ज़मीन पर बिछी कालीन पर गिर पड़े। मेरा चेहरा सीधे उनके दोनों तरबूजों के बीच में जा धंसा, और मुझे उनकी कोमलता और गर्माहट का अहसास हुआ। वह एक पल के लिए चौंक गईं, लेकिन उन्होंने मुझे खुद से दूर नहीं धकेला, बल्कि उनके हाथ मेरी पीठ पर कस गए।
उस झिझक के टूटने के बाद कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया और हम दोनों की सांसें तेज़ चलने लगीं। मैंने धीरे से अपनी नज़रें उठाईं और उनकी आँखों में देखा, जहाँ अब सिर्फ और सिर्फ प्यास और समर्पण था। मैंने हिम्मत जुटाकर अपने होंठ उनके गालों पर रखे, और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। धीरे-धीरे मैं उनके कानों के पास पहुँचा और वहां अपनी गर्म सांसें छोड़ीं, जिससे उनके पूरे शरीर में एक कंपकंपी दौड़ गई। मेरा एक हाथ उनकी कमर से सरकते हुए ऊपर की ओर बढ़ा और मैंने उनके एक तरबूज को हल्के से दबाया। वह आह भर उठीं और उनके मुंह से एक दबी हुई कराह निकली, जिसने मेरे अंदर की आग को और भड़का दिया।
अब संयम की सारी दीवारें ढह चुकी थीं और हम दोनों एक-दूसरे के करीब आने के लिए बेताब थे। मैंने उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोल दिए, जिससे उनके दोनों विशाल तरबूज पूरी तरह आज़ाद होकर बाहर आ गए। वह इतने गोरे और चमकदार थे कि उन पर नीली नसें साफ़ दिखाई दे रही थीं। मैंने अपना मुंह बढ़ाकर उनके एक मटर को अपने दांतों के बीच हल्के से दबाया, जिससे भाभी की कमर ऊपर की ओर धनुष की तरह मुड़ गई। वह बेतहाशा सिसकियां लेने लगीं और उनके हाथ मेरे बालों में फंस गए। मैंने बारी-बारी से दोनों तरबूजों का रस चूसना शुरू किया, जिससे उनका बदन पानी की तरह पिघलने लगा और उनकी साड़ी उनके पैरों के पास गिर गई।
भाभी अब सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में थीं, और उनकी देह किसी अप्सरा जैसी लग रही थी। मैंने उन्हें उठाकर बिस्तर पर लिटाया और उनके पेटीकोट के नाड़े को धीरे से खींचकर ढीला कर दिया। जैसे ही कपड़ा नीचे सरका, उनकी रसीली और गहरी खाई मेरे सामने आ गई, जिसके आसपास काले और मुलायम बाल एक जंगल की तरह फैले हुए थे। वहाँ से एक मीठी और मादक गंध आ रही थी, जो इस बात का संकेत थी कि वह पूरी तरह से गीली और तैयार हो चुकी हैं। मैंने अपनी उंगली को उनकी खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से अंदर सरकाया, तो पाया कि वह शहद की तरह चिपचिपे रस से लबालब भरी हुई थी।
मेरी उंगली की हरकत ने भाभी को पागल कर दिया और वह बिस्तर पर तड़पने लगीं। वह बार-बार कह रही थीं, "आज मुझे पूरी तरह अपना बना लो, मुझे इस प्यास से आज़ादी दिला दो।" मैंने अपनी पैंट उतारकर अपना सख्त और लम्बा खीरा उनके सामने किया, जिसे देखकर उनकी आँखें फ़ैल गईं। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर मेरे खीरे को अपने हाथों में पकड़ लिया और उसे सहलाने लगीं। फिर उन्होंने अपना मुंह खोला और धीरे-धीरे मेरे खीरे को चूसना शुरू किया। उनके गर्म मुंह का स्पर्श और उनकी जीभ की लपलपाहट ने मुझे स्वर्ग का अहसास करा दिया। मेरा खीरा उनकी लार से पूरी तरह गीला और चिकना हो गया था, और अब वह खुदाई के लिए पूरी तरह बेताब था।
मैंने भाभी को बिस्तर पर सीधा लिटाया और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया, जिससे उनकी खाई पूरी तरह खुल गई। मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से एक धक्का दिया। भाभी ने एक जोर की चीख मारी और उनके नाखून मेरी बाहों में धंस गए क्योंकि वह बहुत तंग थीं। मैंने कुछ पल रुककर उन्हें संभलने का मौका दिया और फिर धीरे-धीरे खुदाई शुरू की। जैसे-जैसे मेरा खीरा उनकी तंग खाई की गहराइयों को नाप रहा था, वैसे-वैसे कमरे में उनके कराहने की आवाज़ें गूँजने लगीं। हर धक्के के साथ उनके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और मुझे एक असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी।
खुदाई की गति अब तेज़ हो चुकी थी और कमरे में हमारे शरीर के टकराने की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। मैंने भाभी को घुमाकर पिछवाड़े से खोदने के लिए तैयार किया, वह अपने घुटनों के बल आ गईं। पीछे से उनके भारी पिछवाड़े के बीच से उनकी खाई का नज़ारा और भी कामुक लग रहा था। मैंने अपना खीरा दोबारा उनकी खाई में उतारा और पीछे से जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू किए। भाभी बार-बार तकिए में अपना मुंह छुपाकर सिसकियाँ ले रही थीं और उनका पूरा शरीर पसीने से तर-बतर हो चुका था। वह बार-बार बोल रही थीं, "और ज़ोर से खोदो, आज मेरा सारा रस निकाल दो, मुझे अपनी खुदाई से मार डालो।"
अंततः, जब हम दोनों अपनी चरम सीमा पर पहुँचने वाले थे, मैंने अपनी गति को और तेज़ कर दिया। मेरा शरीर बुरी तरह कांप रहा था और भाभी की खाई की पकड़ मेरे खीरे पर और भी मजबूत हो गई थी। कुछ ही क्षणों में, एक ज़ोरदार धक्के के साथ मेरा सारा गरम रस उनकी खाई की गहराइयों में छूट गया, और साथ ही भाभी का भी रस निकल गया। हम दोनों निढाल होकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, हमारी सांसें अभी भी तेज़ थीं और दिल की धड़कनें एक-दूसरे को सुनाई दे रही थीं। कमरे में छाई शांति उस गहरे आनंद की गवाह थी, जो हमने अभी-अभी महसूस किया था। वह लम्हा सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि दो प्यासी रूहों के मिलन का था।
कुछ देर बाद जब हम होश में आए, तो भाभी ने मुझे गले से लगा लिया और मेरे माथे को चूमते हुए कहा, "तुमने आज मुझे वो सुख दिया है जिसकी मुझे सालों से तलाश थी।" उनकी आँखों में एक अलग ही सुकून था और उनके चेहरे पर एक गुलाबी चमक आ गई थी। हम दोनों ने मिलकर अपनी हालत सुधारी और कपड़े पहने, लेकिन हमारे बीच का वह बंधन अब हमेशा के लिए बदल चुका था। उस दोपहर के बाद, हमारी गुप्त मुलाकातों का सिलसिला यूँ ही चलता रहा, और हर बार वह खुदाई पहले से कहीं ज्यादा गहरी और भावुक होती गई। उनकी खाई अब मेरे खीरे के लिए हमेशा खुली रहती थी, और हमारा यह रिश्ता दुनिया की नज़रों से दूर एक खूबसूरत राज बनकर रह गया।