मौसी रेखा की गहरी खुदाई


गर्मी की वह दोपहरी आज भी मेरे जेहन में ताजा है जब मैं अपनी मौसी रेखा के घर कुछ दिन बिताने गया था। मौसी की उम्र करीब पैंतीस साल रही होगी, लेकिन उनका शरीर किसी कमसिन कली की तरह खिला हुआ था। उनके चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान रहती थी, जो उनकी आँखों की गहराई में छिपी तड़प को छुपा लेती थी। उनके उभरे हुए तरबूज जब उनकी साड़ी के ब्लाउज के भीतर से झांकने की कोशिश करते, तो मेरा दिल अपनी रफ्तार भूल जाता था। उनकी कमर का घेरा और उनके पिछवाड़े की गोलाई किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी थी। मैं अक्सर उन्हें छुप-छुप कर देखता रहता था, और मेरा मन उनकी उस अनछुई खाई के बारे में सोचकर विचलित हो जाता था।

रेखा मौसी का व्यक्तित्व जितना शांत था, उनकी शारीरिक बनावट उतनी ही उत्तेजक थी। जब वह चलती थीं, तो उनके भारी पिछवाड़े एक विशेष लय में डोलते थे, जिसे देखकर मेरे मन में अजीब सी हलचल पैदा होती थी। उनके तरबूजों पर लगे छोटे-छोटे मटर जैसे दाने अक्सर साड़ी के पतले कपड़े के पार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे। मौसा जी अक्सर काम के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे, और शायद यही वजह थी कि मौसी के भीतर भी एक दबी हुई आग सुलग रही थी। उनके शरीर की महक, जो चमेली और पसीने का मिश्रण थी, मुझे उनकी ओर खींचती चली जा रही थी। मैं अक्सर कल्पना करता था कि उस रेशमी साड़ी के नीचे उनके जिस्म का नज़ारा कैसा होगा।

उस शाम घर में कोई नहीं था। मौसी रसोई में रात का खाना बना रही थीं। पसीने की कुछ बूंदें उनके माथे से ढलकर उनके गले के रास्ते नीचे उतर रही थीं और उनके दोनों तरबूजों के बीच की गहरी घाटी में खो रही थीं। मैं पास ही खड़ा उन्हें देख रहा था। अचानक वह मुड़ीं और हमारी नजरें मिल गईं। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह जानती हों कि मेरे मन में क्या चल रहा है। मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी कमर पर रखा। उनकी त्वचा मखमली और गर्म थी। मौसी एक पल के लिए ठिठकीं, उनकी सांसें तेज हो गईं और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। यह मौन स्वीकृति थी, जिसने मेरे भीतर के संयम को तोड़ दिया।

मैंने धीरे से उन्हें अपनी ओर खींचा और उनके होंठों का मीठा रस पीने लगा। मौसी के शरीर में एक कंपन सा हुआ और उन्होंने भी कसकर मुझे थाम लिया। हम दोनों के बीच की झिझक अब पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। मैंने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोले, और जैसे ही उनके गोरे तरबूज आजाद हुए, मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन पर लगे भूरे मटर उत्तेजना से सख्त हो चुके थे। मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर उनकी साड़ी के पल्लू को सरका दिया, जिससे उनकी गहरी खाई और उस पर उगे काले रेशमी बाल साफ नजर आने लगे। वह पूरी तरह से मेरे सामने अपनी प्राकृतिक अवस्था में खड़ी थीं।

मैंने धीरे से उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनके पैरों के बीच बैठ गया। उनकी खाई से एक हल्की सी नमी निकल रही थी, जो इस बात का सबूत थी कि वह भी उतनी ही प्यासी थीं जितना कि मैं। मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर उनकी खाई की उंगली से खुदाई शुरू की। मौसी की आहें कमरे के सन्नाटे को चीरने लगीं। वह अपने कूल्हों को ऊपर उठाकर मेरा साथ देने लगीं। जब मेरी उंगली उनकी गहराई को छूती, तो वह सिसक उठती थीं। मैंने फिर अपने मुंह का रुख नीचे किया और उनकी खाई को जीभ से सहलाना शुरू किया। स्वाद इतना मादक था कि मैं खो गया। मौसी ने मेरे बालों को कसकर पकड़ लिया और कहने लगीं, 'आर्यन, अब और बर्दाश्त नहीं होता, इसे अंदर डाल दो।'

उनकी बात सुनकर मैंने अपना सख्त और लंबा खीरा बाहर निकाला। मेरा खीरा उत्तेजना से पूरी तरह तन चुका था। मैंने मौसी की टांगों को फैलाया और अपने खीरे के ऊपरी हिस्से को उनकी गीली खाई के द्वार पर रखा। जैसे ही मैंने पहला धक्का मारा, मौसी के मुंह से एक लंबी कराह निकली। उनकी खाई बहुत तंग थी, और मेरा खीरा धीरे-धीरे रास्ता बना रहा था। मैंने धीरे-धीरे गति बढ़ानी शुरू की। कमरे में हमारे शरीरों के टकराने की आवाज गूंजने लगी। मौसी ने अपने हाथ मेरे पिछवाड़े पर रखे और मुझे अपनी ओर और जोर से खींचने लगीं। वह बार-बार कह रही थीं, 'हाँ, आर्यन... और गहराई तक खोदो... मुझे पूरा खत्म कर दो।'

खुदाई की यह प्रक्रिया अब अपने चरम पर पहुँच रही थी। मैंने मौसी को घुमाया और उन्हें पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। उनका उभरा हुआ पिछवाड़ा हर धक्के के साथ हिल रहा था। मेरे खीरे का हर अंदरूनी स्पर्श मौसी को पागल कर रहा था। उनकी सांसें उखड़ने लगी थीं और शरीर पसीने से तर-बतर हो चुका था। मैंने फिर से उन्हें सामने से खोदा और अपनी रफ्तार को दोगुना कर दिया। मौसी की आँखें ऊपर चढ़ गईं और उन्होंने मुझे कसकर जकड़ लिया। अचानक उनका शरीर अकड़ने लगा और उनकी खाई से गरम-गरम रस निकलने लगा। ठीक उसी पल, मैंने भी अपना सारा गरम रस उनकी गहराई में छोड़ दिया। हम दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े।

उसके बाद का वह आधा घंटा हम दोनों के लिए दुनिया से परे था। मौसी मेरे सीने पर सिर रखकर लेटी थीं और उनकी सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। उनके चेहरे पर एक ऐसी संतुष्टि थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। हमारा शरीर पसीने की बूंदों से चमचमा रहा था। उस गहरी खुदाई ने हमारे बीच के रिश्ते को एक नया और गुप्त आयाम दे दिया था। मौसी ने मेरी आँखों में देखते हुए धीरे से कहा, 'तुमने आज मुझे वो सुख दिया है जिसके लिए मैं बरसों से तरस रही थी।' हमने एक-दूसरे को फिर से प्यार किया और उस सुकून भरी रात की बाहों में खो गए।