गाँव वाली मामी की जबरदस्त खुदाई


गर्मियों की उन छुट्टियों में जब पूरा गाँव दोपहर की चिलचिलाती धूप से बचने के लिए अपने-अपने घरों के कमरों में दुबका हुआ था, मैं अपने मामा के घर छुट्टियों का आनंद ले रहा था। मामा किसी काम से शहर गए हुए थे और घर में सिर्फ मैं और मेरी जवान मामी, सुनीता, अकेले थे। सुनीता मामी की उम्र करीब 30-32 साल रही होगी, लेकिन उनका शरीर किसी कच्ची कली की तरह खिला हुआ और भरा हुआ था। उनकी साड़ी के पल्लू से जब कभी उनके विशाल और गोल-मटोल तरबूज झांकते थे, तो मेरे मन में एक अजीब सी हलचल पैदा हो जाती थी। उनके शरीर की बनावट ऐसी थी कि कोई भी उन्हें देखकर अपना आपा खो दे। उनका पिछवाड़ा इतना गठीला और उभरा हुआ था कि चलते समय वह किसी लहर की तरह ऊपर-नीचे होता था, जिसे देख मेरा खीरा मेरी पेंट के भीतर ही मचलने लगता था।

उस दिन घर में सन्नाटा था और कूलर की ठंडी हवा कमरे को सुकून पहुँचा रही थी। मामी बिस्तर पर लेटी हुई कोई मैगजीन पढ़ रही थीं, उनकी साड़ी कमर से थोड़ी सरक गई थी जिससे उनकी गोरी और चिकनी कमर साफ़ नजर आ रही थी। मैंने पास जाकर उनके पैरों के पास बैठने की हिम्मत जुटाई। मेरे मन में एक डर भी था और एक तीव्र उत्तेजना भी। जैसे ही मेरा हाथ गलती से उनके पैर से छुआ, उनके शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। मैंने देखा कि उनकी सांसों की गति थोड़ी तेज हो गई थी और उनके सीने पर टिके हुए तरबूज तेजी से ऊपर-नीचे हो रहे थे। उनके चेहरे पर शर्म की एक हल्की सुर्खी तैर गई थी, लेकिन उन्होंने मुझे मना नहीं किया, जिससे मेरा हौसला और बढ़ गया।

मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी पिंडलियों से ऊपर की ओर ले जाना शुरू किया। मेरा दिल इतनी जोर से धड़क रहा था जैसे सीने से बाहर निकल आएगा। मामी ने मैगजीन एक तरफ रख दी और अपनी आँखें बंद कर लीं। जब मेरा हाथ उनकी जांघों के रेशमी अहसास तक पहुँचा, तो उन्होंने एक धीमी सी कराह भरी। मैंने देखा कि उनके ब्लाउज के भीतर छिपे उन मटरों के दाने अब कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे, वे पूरी तरह से सख्त हो चुके थे। मेरा खीरा अब अपनी पूरी ताकत के साथ अंगड़ाई ले रहा था और मुझे उसे आजाद करने की तीव्र इच्छा हो रही थी। हम दोनों के बीच शब्दों की जरूरत नहीं थी, हमारी सांसें ही सब कुछ बयां कर रही थीं।

मैने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोले, तो उनके दूधिया सफ़ेद और रसीले तरबूज मेरी आँखों के सामने आ गए। वे इतने बड़े और भारी थे कि मेरा मन किया कि मैं बस उन्हें देखता ही रहूँ। मैंने झुककर अपने होठों को उनके एक मटर पर रख दिया और उसे धीरे-धीरे चूसना शुरू किया। मामी ने मेरी पीठ को अपनी उंगलियों से जकड़ लिया और उनके मुंह से एक मदहोश कर देने वाली आवाज निकली। इसके बाद मैंने अपनी जीभ से उनकी गहरी और नम खाई को सहलाना शुरू किया। उनकी खाई से निकलने वाला रस अब पूरी तरह से बाहर आने को बेताब था। वह बार-बार अपनी कमर ऊपर उठा रही थीं, मानो मुझे और करीब बुला रही हों।

अब सब्र का बांध टूट चुका था। मैंने अपनी पेंट उतारी और अपने तनाव से भरे हुए खीरे को उनकी आँखों के सामने ले आया। मामी ने उसे अपनी हथेलियों में भरा और उसकी मोटाई को महसूस करते हुए उसे चूमना शुरू कर दिया। उनके मुंह की गर्मी ने मेरे खीरे को और भी ज्यादा सख्त कर दिया था। फिर मैंने उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटाया और उनके सामने से खुदाई करने के लिए तैयार हो गया। जैसे ही मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी रसीली खाई के द्वार पर रखा, मामी ने अपनी आँखें जोर से मींच लीं। मैंने धीरे-धीरे दबाव बनाया और आधा खीरा उनकी खाई की गहराई में समा गया। वह दर्द और आनंद के एक अनूठे संगम में डूब गई थीं और उनकी पकड़ मेरी बाहों पर और मजबूत हो गई थी।

मैंने पूरी ताकत से एक धक्का दिया और मेरा पूरा खीरा उनकी खाई की अंतिम गहराई तक उतर गया। मामी के मुंह से एक लंबी चीख निकली जो फिर एक गहरी सिसकी में बदल गई। अब कमरे में सिर्फ हमारे शरीर के टकराने की आवाजें और भारी सांसें गूँज रही थीं। मैं लगातार उनके भीतर खुदाई कर रहा था, हर धक्के के साथ वह और भी ज्यादा उत्तेजित हो रही थीं। मैंने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खुदाई करने की मुद्रा में ले आया। उनका पिछवाड़ा ऊपर की तरफ उठा हुआ था और पीछे से उनकी खाई और भी ज्यादा आमंत्रित लग रही थी। मैंने फिर से अपने खीरे को उनकी खाई में उतारा और तेज गति से खुदाई शुरू कर दी।

करीब बीस मिनट की उस भीषण खुदाई के बाद, मुझे महसूस हुआ कि मेरा रस अब छूटने वाला है। मामी भी अपनी चरम सीमा पर थीं, उनकी खाई की मांसपेशियां मेरे खीरे को अंदर से कस रही थीं। जैसे ही उनका रस छूटा, मेरा भी गर्म रस उनकी खाई की गहराइयों में भर गया। हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढेर हो गए, पसीने से लथपथ और पूरी तरह से संतुष्ट। उस दिन के बाद से हमारे बीच एक ऐसा अटूट रिश्ता बन गया था जिसे दुनिया की नजरों से छिपाकर हम अक्सर दोपहर की उस खामोशी में दोहराते रहे। वह थकान और वह सुकून आज भी मेरी यादों में ताजा है, जैसे कि वह खुदाई अभी-अभी खत्म हुई हो।