गर्मी की वो दोपहर बहुत ही शांत और बोझिल थी, सूरज अपनी पूरी तपिश बिखेर रहा था और गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ था। मैं अपने कमरे की खिड़की के पास बैठा हुआ था, तभी मेरी नज़र पड़ोस में रहने वाली अंजलि भाभी पर पड़ी जो अपनी बालकनी में कपड़े सुखा रही थीं। उन्होंने एक बहुत ही झीनी और पारभासी साड़ी पहनी हुई थी, जो उनके बदन से चिपकी हुई थी और उनके शरीर के हर उभार को साफ़ बयां कर रही थी। उनके पीठ का खुला हिस्सा और कमर की वो गहरी ढलान देखकर मेरे मन में अजीब सी हलचल होने लगी थी, जो धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही थी।
अंजलि भाभी के शरीर की बनावट किसी अप्सरा से कम नहीं थी, उनके सीने पर सजे वो दो रसीले और बड़े तरबूज साड़ी के ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। जब वो झुककर कपड़ों को तार पर फैलातीं, तो उनके तरबूज का भारीपन और उनके बीच की गहरी घाटी साफ़ दिखाई देती थी। उनके पीछे का हिस्सा यानी उनका पिछवाड़ा इतना गोल और गठीला था कि उसे देखते ही मन में उन्हें कसकर पकड़ने की तीव्र इच्छा जागृत हो जाती थी। वो जैसे-जैसे हिलतीं, उनके अंगों की वो थरथराहट मेरे भीतर के सोए हुए खीरे को जगाने के लिए काफी थी।
मेरे और उनके बीच एक अजीब सा भावनात्मक खिंचाव हमेशा से रहा था, हम अक्सर घंटों बातें करते थे और उन बातों में एक अनकहा आकर्षण छुपा होता था। उस दिन जब मैंने उनके घर का दरवाजा खटखटाया, तो उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ मेरा स्वागत किया, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक और प्यास थी जो शायद मेरी ही तरह अधूरी थी। घर में कोई नहीं था, सन्नाटा और गहरा गया था और उस सन्नाटे में हमारी धड़कनों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। हमने सोफे पर बैठकर बातें शुरू कीं, लेकिन मेरा ध्यान लगातार उनके हिलते हुए तरबूजों पर ही अटका हुआ था।
बातों-बातों में हमारा हाथ एक-दूसरे से टकराया और जैसे बिजली का कोई तेज़ करंट दौड़ गया हो, हम दोनों ही कांप उठे। अंजलि भाभी ने अपनी नज़रें नीचे झुका लीं, लेकिन उन्होंने अपना हाथ पीछे नहीं हटाया, जो इस बात का संकेत था कि वो भी उसी आग में जल रही थीं। मैंने धीरे से अपनी उंगलियां उनकी मखमली त्वचा पर फेरीं, तो उनके बदन में एक सिहरन दौड़ गई और उन्होंने एक गहरी आह भरी। उस पल सारी झिझक और लोक-लाज की दीवारें ढह गईं और आकर्षण का वो ज्वालामुखी फूटने को तैयार हो गया जो बरसों से दबा हुआ था।
मैंने हिम्मत जुटाकर उन्हें अपनी बाहों में भर लिया और उनके चेहरे को करीब लाकर उनके होंठों का रस चखने लगा, उनका बदन मोम की तरह पिघलने लगा था। मेरे हाथ उनके ब्लाउज के अंदर घुसकर उन गरम और मुलायम तरबूजों को सहलाने लगे, जिनकी मटर जैसी घुंडियां अब सख्त होकर मेरे स्पर्श का इंतज़ार कर रही थीं। वो मदहोशी में अपनी आँखें बंद किए हुए थीं और उनके मुँह से निकलने वाली सिसकियां कमरे की खामोशी को चीर रही थीं। मैंने धीरे-धीरे उनके कपड़ों को जिस्म से अलग करना शुरू किया, जिससे उनका कुंदन जैसा शरीर मेरे सामने पूरी तरह उजागर हो गया।
जैसे ही वो पूरी तरह से निर्वस्त्र हुईं, मेरी आँखों के सामने कुदरत का सबसे हसीन नज़ारा था, उनके तरबूज और उनके बीच की काली मटर साफ़ चमक रही थी। नीचे की ओर बढ़ते ही उनकी रेशमी खाई दिखाई दी, जहाँ काले और घने बाल उस प्रवेश द्वार की रखवाली कर रहे थे जो अब पूरी तरह नम हो चुका था। मैंने नीचे झुककर अपनी जीभ से उनकी खाई को चाटना शुरू किया, तो वो कराह उठीं और उनके हाथ मेरे बालों में फंस गए। उनकी खाई से निकलने वाला अमृत अब मेरे मुँह का स्वाद बढ़ा रहा था और वो पूरी तरह से बेकाबू होकर अपना पिछवाड़ा हिला रही थीं।
अब सब्र का बांध टूट चुका था, मेरा खीरा पूरी तरह से लोहे जैसा सख्त होकर अपनी मंज़िल यानी उनकी खाई में उतरने के लिए बेकरार था। मैंने उन्हें बिस्तर पर लेटाया और उनके दोनों पैरों को फैलाकर अपनी स्थिति संभाली, वो कांपती हुई आवाज़ में मुझसे बस शुरू करने की विनती कर रही थीं। जैसे ही मैंने अपने खीरे का अगला हिस्सा उनकी तंग और रसीली खाई के मुहाने पर रखा, उन्होंने एक लंबी सांस ली और अपनी कमर ऊपर उठा ली। मैंने एक ज़ोरदार धक्का लगाया और मेरा आधा खीरा उनकी उस गरम और तंग खाई के भीतर समा गया, जिससे उनके मुंह से एक ज़ोरदार चीख निकल गई।
खुदाई की प्रक्रिया अब बहुत ही गहराई और तेज़ी के साथ शुरू हो चुकी थी, हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी खाई की गहराइयों को नाप रहा था। कमरे में केवल हमारे शरीरों के टकराने की 'चप-चप' वाली आवाज़ और उनकी मदहोश कर देने वाली आहें गूँज रही थीं। मैंने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, तो उन्हें और भी ज़्यादा आनंद आने लगा और वो ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगीं। खुदाई इतनी दमदार थी कि उनके तरबूज पागलों की तरह ऊपर-नीचे उछल रहे थे और पसीने से लथपथ हमारे बदन एक-दूसरे में पूरी तरह विलीन हो चुके थे।
काफी देर तक चली इस जबरदस्त खुदाई के बाद, हम दोनों ही चरम सीमा पर पहुँच चुके थे और अचानक एक तेज़ लहर उठी जिससे हम दोनों के शरीर कांपने लगे। मेरा खीरा उनके भीतर गरमाहट छोड़ने लगा और उनका भी रस पूरी तरह से निकलकर बाहर बहने लगा, जिससे वो पूरी तरह निढाल होकर मेरे नीचे दब गईं। खुदाई के बाद की वो शांति बहुत ही सुखद थी, उनकी सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं लेकिन उनके चेहरे पर एक असीम संतुष्टि और सुकून साफ़ झलक रहा था। हम दोनों घंटों वैसे ही लिपटे रहे, उस अहसास को महसूस करते हुए जो शायद हमें हमेशा के लिए एक-दूसरे का बना चुका था।