होटल की मदहोश रात और मीरा की अनकही चाहत --->


होटल की आलीशान गलियारे में समीर अपनी थकान मिटाने के लिए टहल रहा था जब उसकी मुलाकात मीरा से हुई। मीरा एक अजनबी थी जो उसी मंजिल के दूसरे कमरे में ठहरी हुई थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी कशिश थी जिसने समीर के कदमों को थाम दिया। मीरा की कद-काठी किसी अप्सरा जैसी थी, उसकी रेशमी साड़ी उसके जिस्म के उतार-चढ़ाव को बखूबी बयां कर रही थी। उसके सीने पर उभरे हुए वे भारी तरबूज समीर की धड़कनों को बढ़ाने के लिए काफी थे, जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। समीर ने जब पहली बार उसकी आँखों में देखा, तो उसे लगा जैसे वह बरसों से उसे जानता हो, और उस अजनबी शहर के होटल में दोनों के बीच एक अनकहा सा रिश्ता उसी पल जन्म ले चुका था।

मीरा के शरीर की बनावट देख समीर का मन मचलने लगा था, उसकी कमर इतनी पतली थी कि जैसे कोई सुराही हो, और उसके नीचे का भारी पिछवाड़ा समीर की कल्पनाओं को पंख दे रहा था। समीर ने धीरे से बात शुरू की और जल्द ही दोनों एक-दूसरे के कमरे के पास खड़े होकर हंसी-मजाक करने लगे। मीरा की खिलखिलाहट में एक अजीब सा निमंत्रण था, जो समीर को अपनी ओर खींच रहा था। बातों-बातों में मीरा ने समीर को अपने कमरे के अंदर आने का इशारा किया, और जैसे ही समीर ने उस कमरे की चौखट पार की, होटल के उस ठंडे कमरे का वातावरण अचानक से गर्म होने लगा। दोनों के बीच एक गहरा आकर्षण साफ महसूस किया जा सकता था जो अब किसी सीमा को मानने को तैयार नहीं था।

कमरे के अंदर की मद्धम रोशनी में मीरा के चेहरे पर एक गजब की लाली छाई हुई थी, जो उसकी झिझक और बढ़ती हुई उत्तेजना का मिश्रण थी। समीर ने धीरे से मीरा का हाथ अपने हाथ में लिया, और उसकी कोमल त्वचा के स्पर्श ने समीर के भीतर एक बिजली सी दौड़ा दी। मीरा ने अपनी आँखें झुका लीं, लेकिन उसका कांपता हुआ हाथ समीर के इरादों को भांप चुका था। समीर ने बड़े प्यार से मीरा को अपनी बाहों में समेटा, जिससे उसके वे विशाल तरबूज समीर के सीने से पूरी तरह चिपक गए। मीरा के मुँह से एक धीमी सी आह निकली और उसने अपना सिर समीर के कंधे पर रख दिया, जैसे वह इस पल का सदियों से इंतजार कर रही हो।

समीर ने अपनी उंगलियों से मीरा के चेहरे की जुल्फों को हटाया और उसके होंठों के पास अपनी सांसों की गर्मी छोड़ी। उसने धीरे से मीरा के ब्लाउज के ऊपर से ही उसके रसीले तरबूजों को सहलाना शुरू किया, जिससे मीरा की सांसें तेज होने लगीं। जब समीर के अंगूठे ने उन तरबूजों के ऊपर मौजूद नन्हे और सख्त मटरों को हल्का सा दबाया, तो मीरा ने कसकर समीर को पकड़ लिया। उन मटरों की सख्ती समीर को बता रही थी कि मीरा अब पूरी तरह से तैयार है। समीर ने धीरे से मीरा की साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया, जिससे उसके वे दूधिया तरबूज अब समीर की आँखों के सामने पूरी तरह नुमाया थे, और समीर ने झुककर उन मटरों का रसपान करना शुरू कर दिया।

जैसे-जैसे समीर की हरकतें बढ़ रही थीं, मीरा का शरीर बेकाबू होता जा रहा था। समीर ने मीरा के कपड़ों को धीरे-धीरे अलग किया और अब मीरा पूरी तरह से प्राकृतिक अवस्था में उसके सामने थी। समीर की नजरें मीरा के जांघों के बीच मौजूद उस गहरी और गीली खाई पर टिक गईं, जिसके चारों ओर काले और घने बाल बिखरे हुए थे। उस खाई से रिसता हुआ प्राकृतिक रस समीर को पागल कर रहा था। समीर ने घुटनों के बल बैठकर अपनी जुबान से उस खाई को चाटना शुरू किया, जिससे मीरा बिस्तर की चादरों को अपने हाथों में भींचने लगी। मीरा के मुँह से निकलने वाली सिसकारियां उस शांत कमरे में संगीत की तरह गूंज रही थीं।

अब समीर ने अपने कपड़ों को उतारा और उसका विशाल और फौलादी खीरा पूरी तरह से बाहर निकल आया, जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ खड़ा था। मीरा ने जब उस विशाल खीरे को देखा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर उस खीरे को छुआ और फिर उसे अपने मुँह के अंदर ले लिया। मीरा का खीरा चूसना इतना आनंददायक था कि समीर की आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। वह बड़ी कुशलता से उस खीरे के ऊपरी हिस्से को अपनी जीभ से सहला रही थी, जिससे समीर के शरीर में सिहरन पैदा हो रही थी। कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद समीर ने मीरा को बिस्तर पर लेटा दिया और अब असली खुदाई का वक्त आ गया था।

समीर ने मीरा की दोनों टांगों को अपने कंधों पर रखा और अपने फौलादी खीरे को उस गीली और तंग खाई के मुहाने पर टिका दिया। एक हल्के से दबाव के साथ उसने खीरे को खाई के अंदर धकेला, जिससे मीरा के मुँह से एक जोर की कराह निकली। जैसे-जैसे वह सामने से खुदाई कर रहा था, कमरे में शरीर के टकराने की आवाजें और मीरा की सिसकारियां गूंज रही थीं। समीर के हर धक्के के साथ मीरा के तरबूज हवा में उछल रहे थे और उसके मटर और भी ज्यादा सख्त होते जा रहे थे। मीरा ने समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए थे, और वह भी बराबर की ऊर्जा के साथ समीर का साथ दे रही थी, जैसे वह इस खुदाई का पूरा मजा लेना चाहती हो।

कुछ देर तक सामने से खुदाई करने के बाद, समीर ने मीरा को पलटने का इशारा किया। अब मीरा अपने घुटनों और हाथों के बल पर खड़ी थी और उसका भारी पिछवाड़ा समीर के ठीक सामने था। समीर ने पीछे से उस गहरी खाई में फिर से अपना खीरा उतारा और पिछवाड़े से खुदाई शुरू की। यह स्थिति और भी ज्यादा रोमांचक थी, क्योंकि यहाँ से समीर मीरा के पूरे शरीर की हरकत को देख पा रहा था। समीर ने मीरा के तरबूजों को पीछे से ही अपने हाथों में जकड़ लिया और पूरी ताकत के साथ धक्के लगाने लगा। मीरा बार-बार कह रही थी, "समीर, और जोर से... मुझे पूरी तरह से खोदो, आज कुछ बाकी मत छोड़ना!" उसकी बातों ने समीर के जोश को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया।

खुदाई अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी, समीर और मीरा दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे। समीर की गति अब और भी ज्यादा तेज हो गई थी और मीरा भी पागलों की तरह अपना पिछवाड़ा हिला रही थी। अचानक मीरा का शरीर पूरी तरह से अकड़ गया और उसकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलने लगा, वह अपने रस छूटने के आनंद में पूरी तरह खो गई। ठीक उसी पल, समीर ने भी दो-तीन आखिरी और जोरदार धक्के लगाए और अपने खीरे से सारा गर्म लावा मीरा की खाई की गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, उनकी सांसें बुरी तरह फूल रही थीं, लेकिन उनके चेहरों पर एक असीम संतुष्टि और सुकून का भाव था।

उस गहरी खुदाई के बाद मीरा समीर की बाहों में दुबक कर सो गई। समीर उसके माथे को चूमते हुए उस यादगार रात के बारे में सोच रहा था। कमरे में अब भी उनकी महक और उस क्रिया की गर्मी बाकी थी। समीर को महसूस हुआ कि यह सिर्फ शारीरिक संबंध नहीं था, बल्कि उस होटल के कमरे में दो अजनबियों ने एक-दूसरे की रूह को भी छुआ था। मीरा की हालत अब बिल्कुल शांत थी, जैसे किसी बड़े तूफान के बाद समंदर शांत हो जाता है। उस रात की खुदाई ने उनके बीच एक ऐसा बंधन बना दिया था जिसे वे शायद कभी नहीं भूल पाएंगे, और अगली सुबह जब वे अलग हुए, तो उनकी आँखों में फिर से मिलने का एक मौन वादा साफ झलक रहा था।