सफर की एक हसीन और मदहोश कर देने वाली रात--->राजेश अपनी ट्रेन की सीट पर बैठा खिड़की से बाहर भागते अंधेरे को देख रहा था कि तभी उसकी नजर सामने वाली सीट पर बैठी सुनीता पर पड़ी। सुनीता की उम्र करीब पैंतीस के आसपास रही होगी लेकिन उसके बदन की ढलान और कसावट किसी बीस साल की जवान लड़की को मात दे रही थी। उसने गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी जिसके नीचे से उसके गोल और भारी तरबूज बार-बार झाँक रहे थे और जैसे-जैसे ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ रही थी राजेश के दिल की धड़कनें भी सुनीता के उन नज़ारों को देखकर बढ़ने लगी थीं। उन दोनों की नजरें जब मिलीं तो एक अनजाना सा खिंचाव महसूस हुआ जो शब्दों से परे था और कमरे में फैली खामोशी अब भारी होने लगी थी।
सुनीता के बदन की महक पूरे केबिन में फैल रही थी और राजेश ने गौर किया कि उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया है जिससे उसके उन रसीले तरबूजों के बीच की गहरी घाटी साफ नजर आ रही थी। उन तरबूजों के सिरों पर उभरे हुए मटर साड़ी के पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे जो राजेश की नसों में बिजली दौड़ाने के लिए काफी थे। राजेश की नजरें बार-बार सुनीता के चेहरे से फिसलकर उसके भारी वक्षों पर जाकर टिक जाती थीं और उसे अहसास हो रहा था कि सुनीता भी उसकी इस बेताबी को महसूस कर रही है और शायद वह भी इसी पल का इंतजार कर रही थी।
बातों-बातों में पता चला कि सुनीता काफी समय से अकेली है और आज की रात वह अपनी तन्हाई को किसी के साथ बांटना चाहती थी। राजेश ने धीरे से अपना हाथ सुनीता के घुटने पर रखा तो उसने कोई विरोध नहीं किया बल्कि अपनी आँखें मूंद लीं जिससे राजेश का हौसला और बढ़ गया। उसने महसूस किया कि सुनीता का शरीर भी उत्तेजना से कांप रहा है और उसके मन में दबी हुई इच्छाएं अब बाहर निकलने के लिए मचल रही हैं। उन दोनों के बीच एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव उसी पल बन गया था जहाँ जिस्मानी चाहत अब रूहानी प्यास में बदलने लगी थी और केबिन की ठंडी हवा अब गर्म होने लगी थी।
राजेश ने धीरे से सुनीता को अपनी ओर खींचा और उसके अधरों का रसपान करने लगा जो बहुत ही मीठे और नशीले थे। सुनीता ने भी अपनी बाहें राजेश के गले में डाल दीं और दोनों एक-दूसरे में खो गए जैसे बरसों की प्यास बुझा रहे हों। राजेश का हाथ धीरे-धीरे सुनीता की साड़ी के भीतर सरकने लगा और उसने उन मुलायम तरबूजों को अपनी हथेलियों में भर लिया। जैसे ही उसने उन मटरों को अपनी उंगलियों से सहलाया सुनीता के मुंह से एक दबी हुई आह निकली जिसने राजेश के खीरे में जान फूंक दी और वह अब अपनी पैंट के भीतर पूरी तरह से तन चुका था।
राजेश की बेताबी बढ़ती जा रही थी और उसने सुनीता को धीरे से लिटा दिया और उसकी साड़ी के बंधनों को पूरी तरह से मुक्त कर दिया। अब सुनीता का नग्न शरीर उसके सामने था जो दूध की तरह सफेद और मक्खन की तरह मुलायम लग रहा था। राजेश ने अपनी जीभ से उसके तरबूजों को चाटना शुरू किया और फिर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उसकी रेशमी खाई तक पहुँच गया। वहां के घने बालों के बीच छिपी हुई खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और राजेश ने जब अपनी उंगली से उस खाई को खोदना शुरू किया तो सुनीता अपनी कमर ऊपर उठाने लगी और उसके मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं।
सुनीता अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी और उसने राजेश की पैंट खोलकर उसके गर्म और सख्त खीरे को बाहर निकाल लिया। उस खीरे की लंबाई और मोटाई देखकर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई और उसने बिना देर किए उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया। वह बड़ी ही कुशलता से खीरे को चूस रही थी और राजेश को स्वर्ग का अहसास हो रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि अब उसका रस निकलने ही वाला है लेकिन उसने खुद पर काबू पाया क्योंकि असली खेल तो अभी शुरू होना बाकी था और वह इस खुदाई का पूरा मजा लेना चाहता था।
राजेश ने सुनीता को बिस्तर पर लिटाया और उसकी दोनों टांगों को फैलाकर अपनी जगह बनाई ताकि वह सामने से खुदाई कर सके। जैसे ही राजेश का खीरा उस तंग और फिसलन भरी खाई के मुहाने पर पहुँचा दोनों के शरीरों में एक करंट सा दौड़ गया। राजेश ने एक झटके में अपने खीरे को पूरी तरह से खाई के भीतर धकेल दिया और सुनीता की एक लंबी कराह केबिन की दीवारों से टकराई। वह खुदाई इतनी गहरी और प्रभावशाली थी कि सुनीता के चेहरे पर दर्द और आनंद का मिला-जुला भाव उभर आया और वह राजेश की पीठ पर अपने नाखून गड़ाने लगी।
केबिन के भीतर अब सिर्फ टकराने की आवाजें और भारी सांसों का शोर था क्योंकि राजेश पूरी ताकत से खाई को खोद रहा था। हर धक्के के साथ सुनीता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके ऊपर लगे मटर कड़े होकर राजेश के सीने से रगड़ खा रहे थे। सुनीता बार-बार राजेश को और गहरा खोदने के लिए कह रही थी और उसकी आँखों में छाई मदहोशी राजेश को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थी। वह पल अब करीब था जब दोनों का रस छूटने वाला था और पूरी कायनात जैसे उसी एक बिंदु पर सिमट गई थी जहाँ सिर्फ जिस्मों की पुकार थी।
अंत में राजेश ने अपनी रफ्तार और बढ़ा दी और सुनीता की कमर को कसकर पकड़ लिया ताकि खुदाई अपने चरम पर पहुँच सके। कुछ ही पलों के बाद राजेश का खीरा गरम रस छोड़ने लगा जो सुनीता की खाई के भीतर पूरी तरह से भर गया और ठीक उसी वक्त सुनीता का भी रस निकल गया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बेदम होकर गिर पड़े और उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। उस रात की वह खुदाई उनके दिलों में हमेशा के लिए दर्ज हो गई थी और ट्रेन की गड़गड़ाहट के बीच वे दोनों एक नई तृप्ति के साथ अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे।
खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही सुखद थी और राजेश ने सुनीता को अपनी बाहों में समेट लिया जैसे वह कोई कीमती खजाना हो। सुनीता का चेहरा पसीने से भीगा हुआ था और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और संतुष्टि थी जो पहले कभी नहीं देखी गई थी। वे दोनों काफी देर तक वैसे ही लेटे रहे और एक-दूसरे के जिस्म की गर्माहट को महसूस करते रहे। सुबह की पहली किरण के साथ जब वे अपनी मंजिल पर पहुँचे तो उनके बीच शब्दों की जरूरत नहीं थी क्योंकि उनके जिस्मों ने एक-दूसरे से वह सब कुछ कह दिया था जो कभी जुबां नहीं कह सकती थी।