दोपहर की चिलचिलाती धूप में पूरी गली में सन्नाटा पसरा हुआ था और सिर्फ परिंदों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी। रोहन अपने कमरे में लेटा हुआ खिड़की से बाहर देख रहा था, तभी उसकी नजर पड़ोस में रहने वाली सुषमा भाभी पर पड़ी जो अपने आँगन में कपड़े सुखा रही थीं। सुषमा भाभी की उम्र करीब 32 साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट किसी को भी दीवाना बनाने के लिए काफी थी। उनकी चाल में एक ऐसी मादकता थी जो रोहन के दिल की धड़कनें बढ़ा देती थी। आज उन्होंने एक हल्की नीली साड़ी पहनी थी, जो उनके गोरे रंग पर खूब खिल रही थी।
सुषमा भाभी के सीने पर लदे हुए दो विशाल और गोल-गोल तरबूज साड़ी के पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। जब वो झुककर कपड़े उठाती थीं, तो उनके तरबूज का भारीपन साफ नजर आता था और उनके ऊपर लगे नन्हे मटर साड़ी के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। रोहन की नजरें उनके तरबूज से हटकर उनके भारी और गदराए हुए पिछवाड़े पर जा टिकीं, जो हर कदम के साथ एक लय में थिरक रहा था। रोहन का मन व्याकुल होने लगा और उसके शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
अचानक सुषमा भाभी ने रोहन की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए उसे अंदर आने का इशारा किया। रोहन का दिल जोरों से धड़कने लगा, वह झिझकते हुए उनके घर पहुँचा। भाभी ने कहा कि उनके बेडरूम का पंखा कुछ आवाज कर रहा है, क्या वह देख सकता है? जैसे ही रोहन कमरे में दाखिल हुआ, भाभी ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया। कमरे की खुशबू और भाभी की नजदीकी ने रोहन के होश उड़ा दिए थे। रोहन ने पंखे की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन भाभी उसके ठीक पीछे खड़ी थीं, उनके शरीर की गर्मी रोहन को महसूस हो रही थी।
भाभी ने धीरे से अपना हाथ रोहन के कंधे पर रखा और फुसफुसाते हुए कहा, 'रोहन, आज घर में कोई नहीं है, मुझे बहुत अकेलापन महसूस हो रहा है।' रोहन ने पलटकर देखा तो भाभी की आँखों में गहरी प्यास थी। रोहन ने हिम्मत जुटाकर भाभी के तरबूज को हल्के से छुआ, भाभी ने एक लंबी आह भरी और अपनी आँखें मूंद लीं। उनके तरबूज इतने नरम और मखमली थे कि रोहन का मन उन्हें बार-बार सहलाने का करने लगा। भाभी ने रोहन के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों को चूमने लगीं।
धीरे-धीरे दोनों के बीच की झिझक खत्म होने लगी और रोहन ने भाभी की साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया। अब उनके गोल और उभरे हुए तरबूज पूरी तरह से रोहन की नजरों के सामने थे। रोहन ने झुककर भाभी के तरबूज पर लगे गुलाबी मटर को अपने मुँह में भर लिया और उन्हें धीरे-धीरे सहलाने लगा। भाभी की सिसकारियां कमरे में गूँजने लगीं, वो रोहन के बालों में अपनी उंगलियां फँसाकर उसे और करीब खींचने लगीं। रोहन का हाथ नीचे गया और उसने भाभी की रेशमी खाई को छुआ, जो अब तक पूरी तरह गीली हो चुकी थी।
रोहन ने अपनी उंगली से भाभी की खाई में खुदाई शुरू की, जिससे भाभी के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। उन्होंने रोहन की पैंट की चैन खोली और उसके सख्त और लंबे खीरे को बाहर निकाल लिया। भाभी ने रोहन के खीरे को अपने हाथों में लेकर सहलाया और फिर उसे अपने मुँह में भरकर चूसना शुरू कर दिया। रोहन को ऐसा सुख मिल रहा था जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसका खीरा अब पूरी तरह से पत्थर जैसा सख्त हो चुका था और खुदाई के लिए तैयार था।
भाभी बिस्तर पर लेट गईं और अपनी टांगें फैला दीं, जिससे उनकी गहरी और रसीली खाई पूरी तरह खुल गई। रोहन ने अपने खीरे की नोक को भाभी की खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से धक्का दिया। भाभी ने दर्द और आनंद की एक मिली-जुली चीख निकाली। जैसे ही रोहन ने पूरी ताकत से धक्का दिया, उसका पूरा खीरा भाभी की तंग खाई में समा गया। भाभी ने रोहन को अपनी बाहों में कस लिया और जोर-जोर से उसकी पीठ को सहलाने लगीं। कमरे में केवल खुदाई की आवाजें गूँज रही थीं।
रोहन अब सामने से खुदाई कर रहा था, हर धक्के के साथ भाभी का पूरा शरीर हिल रहा था और उनके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। भाभी चिल्ला रही थीं, 'रोहन, और जोर से खोदो, आज मुझे पूरी तरह भर दो!' रोहन ने भाभी की पोजीशन बदली और उन्हें घुटनों के बल बैठाकर पिछवाड़े से खुदाई शुरू की। पीछे से वार होते ही भाभी के चेहरे पर चरम सुख के भाव आ गए। रोहन की खुदाई की रफ्तार और तेज होती गई, और अंत में दोनों का रस एक साथ छूटने लगा। भाभी की खाई रोहन के गरम रस से पूरी तरह भर गई।
खुदाई खत्म होने के बाद दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए गहरी सांसें ले रहे थे। सुषमा भाभी के चेहरे पर एक अजीब सी शांति और संतुष्टि थी। उन्होंने रोहन के माथे को चूमा और कहा, 'तुमने आज मुझे वो सुख दिया है जिसकी मुझे सालों से तलाश थी।' रोहन भी पूरी तरह थक चुका था लेकिन उसके मन में एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा था। उस दोपहर की उस गुप्त खुदाई ने उन दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया था जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन था। दोनों ने तय किया कि यह सिलसिला अब यूँ ही चलता रहेगा।