
मामी की रसीली चु@@ई--->गर्मी की वे सुनहरी दोपहरें आज भी मेरे जहन में किसी ताज़ा जख्म और मीठी याद की तरह बसी हुई हैं जब मैं अपने मामा के घर छुट्टियां बिताने गया था। गाँव का वह बड़ा सा पुश्तैनी मकान जहाँ सन्नाटा भी अपनी एक अलग ही भाषा बोलता था और हवाओं में मिट्टी और आम के बगीचों की सोंधी खुशबू घुली रहती थी। मामा शहर के काम से बाहर गए हुए थे और घर में सिर्फ मैं और मेरी जवान मामी सुनीता ही थे जो अपनी उम्र के तीसरे दशक के मध्य में थीं। वह सादगी और आकर्षण का एक ऐसा मिश्रण थीं जिसे देख कर कोई भी अपनी सुध-बुध खो सकता था और मैं तो वैसे भी जवानी की दहलीज पर खड़ा एक जिज्ञासु युवक था।
सुनीता मामी के शरीर की बनावट किसी सजी हुई मूरत जैसी थी जिसे कुदरत ने बहुत फुर्सत में तराशा था और उनकी हर अदा में एक अजीब सी मादकता छिपी रहती थी। जब वह चलती थीं तो उनके भारी और गोल पिछवाड़े की थिरकन मेरी आँखों को अपनी ओर खींच लेती थी और रेशमी साड़ी के भीतर छिपे उनके दो रसीले तरबूज हर सांस के साथ ऊपर-नीचे होते थे। उनके तरबूजों की गोलाई इतनी मुकम्मल थी कि साड़ी का पल्लू भी उन्हें पूरी तरह ढकने में नाकाम रहता था और अक्सर उन पर उभरे हुए नन्हे मटर अपनी मौजूदगी का अहसास कराते रहते थे। उनकी कमर का घेरा और उस पर पड़ने वाले बल किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी थे और मैं बस उन्हें दूर से निहार कर अपनी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ाता रहता था।
हमारे बीच एक अनकहा सा खिंचाव बढ़ने लगा था जो शब्दों से कहीं ज्यादा गहरी और जज्बाती खामोशियों में छिपा हुआ था जिसकी तपिश हम दोनों महसूस कर रहे थे। वह अक्सर मेरे पास से गुजरते समय जानबूझकर अपनी बाहें मेरे कंधे से छुआ देती थीं जिससे मेरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ जाती थी और मेरा मन अशांत हो उठता था। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक और प्यास नजर आती थी जो शायद मामा की गैरमौजूदगी और अकेलेपन का नतीजा थी जिसने उन्हें अंदर से बेचैन कर रखा था। मैं भी उनकी उस प्यास को समझ रहा था और मेरा मन भी उसी आग में जल रहा था जो धीरे-धीरे हमारे बीच की लोक-लाज की दीवारों को गिराने लगी थी।
उस दोपहर सूरज अपनी पूरी शिद्दत के साथ आग उगल रहा था और घर के भीतर का तापमान भी भावनाओं की गर्मी से बढ़ने लगा था तभी मामी ने मुझे पास बुलाया। वह सोफे पर बैठी पसीने से तर-बतर थीं और उनकी साड़ी का पल्लू नीचे खिसक गया था जिससे उनके गोरे तरबूजों का आधा हिस्सा और गहरी खाई साफ नजर आ रही थी। मैंने उनके पास जाकर बैठने की हिम्मत जुटाई तो उन्होंने अपनी नशीली आँखों से मेरी ओर देखा और धीरे से मेरा हाथ पकड़ कर अपनी रेशमी जांघों पर रख दिया। उस पहले स्पर्श ने जैसे हमारे बीच के सारे बांध तोड़ दिए और हम दोनों एक-दूसरे की सांसों की खुशबू में खो गए जहाँ सिर्फ चाहत का शोर था।
मेरी धड़कनें तेज हो गई थीं और मैंने धीरे से अपना हाथ ऊपर बढ़ाते हुए उनके रेशमी तरबूजों को सहलाना शुरू किया जो छुअन पाकर और भी सख्त हो गए थे। मामी ने एक गहरी आह भरी और अपनी आँखें मूंद लीं जैसे वह सदियों से इसी पल का इंतजार कर रही थीं और उनका पूरा शरीर थरथराने लगा था। मैंने उनके मटर जैसे निप्पलों को अपनी उंगलियों के बीच लेकर धीरे से दबाया तो उनके मुंह से एक सिसकारी निकली जिसने कमरे के सन्नाटे को और भी कामुक बना दिया। वह धीरे-धीरे मेरे करीब आ गईं और अपनी बाहें मेरे गले में डाल दीं जिससे उनके शरीर की गर्मी सीधे मेरे सीने में उतरने लगी और मेरा संयम जवाब देने लगा।
अब हमारा आकर्षण और भी गहरा हो गया था और मैंने धीरे से उनके होठों को चूमना शुरू किया जो शहद की तरह मीठे और गुलाब की पंखुड़ियों जैसे नर्म थे। उनके होठों का स्वाद लेते हुए मेरा हाथ उनकी साड़ी के भीतर चला गया और मैं उनकी रेशमी त्वचा को महसूस करने लगा जो उत्तेजना के मारे गर्म हो चुकी थी। उन्होंने भी अपने हाथ मेरे शरीर पर चलाने शुरू किए और धीरे से मेरे पजामे के ऊपर से ही मेरे उभरते हुए खीरे को महसूस किया जिससे मेरी रगों में खून का बहाव तेज हो गया। हम दोनों एक-दूसरे के शरीर को पागलों की तरह टटोल रहे थे और कपड़ों की बाधा अब हमें बर्दाश्त नहीं हो रही थी जो हमारी प्यास के बीच दीवार बन रहे थे।
धीरे-धीरे हमने एक-दूसरे के सारे कपड़े उतार दिए और अब हम पूरी तरह कुदरती हालत में एक-दूसरे के सामने थे जहाँ कुछ भी छिपा हुआ नहीं था। मामी का शरीर नग्न अवस्था में किसी अप्सरा जैसा लग रहा था और उनकी टांगों के बीच की वह रसीली और गहरी खाई अब पूरी तरह से साफ नजर आ रही थी। मैंने नीचे झुककर उनकी उस रेशमी खाई को निहारना शुरू किया जहाँ बारीक काले बाल एक कुदरती कालीन की तरह बिछे हुए थे और वहां से उठने वाली खुशबू ने मुझे दीवाना बना दिया। मैंने अपनी जीभ से उनकी खाई को चाटना शुरू किया तो वह बिस्तर पर तड़पने लगीं और उनके हाथों ने मेरे बालों को मजबूती से जकड़ लिया जैसे वह इस सुख को पूरी तरह पीना चाहती हों।
मामी की उत्तेजना अब सातवें आसमान पर थी और उन्होंने मुझे अपने ऊपर खींचते हुए मेरे खीरे को अपने हाथों में पकड़ लिया जो अब पूरी तरह सख्त और लंबा हो चुका था। उन्होंने बड़े प्यार से मेरे खीरे को अपने मुंह में लिया और उसे चूसने लगीं जिससे मुझे स्वर्ग जैसा आनंद महसूस होने लगा और मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उनके मुंह की गर्मी और जीभ का स्पर्श मेरे खीरे की हर नस को झकझोर रहा था और मेरा मन कर रहा था कि बस इसी पल में थम जाऊं। लेकिन प्यास अभी बाकी थी और खुदाई का असली रोमांच तो अभी शुरू होना था जिसके लिए हम दोनों ही पूरी तरह से बेकरार और तैयार थे।
मैंने मामी को बिस्तर पर लिटाया और उनकी टांगों को चौड़ा करके अपनी जगह बनाई जहाँ से उनकी गुलाबी खाई मेरा स्वागत करने के लिए पूरी तरह गीली और तैयार खड़ी थी। मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी खाई के द्वार पर रखा और धीरे से अंदर धकेलने की कोशिश की तो उन्होंने एक दर्दभरी लेकिन आनंददायक कराह छोड़ी। जैसे ही मेरा आधा खीरा उनकी तंग खाई के भीतर समाया मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी रेशमी दलदल में धंसता जा रहा हूँ जहाँ से बाहर निकलना नामुमकिन था। मामी ने अपने पैरों को मेरी कमर के गिर्द लपेट लिया और मुझे जोर से अपनी तरफ खींचा ताकि मैं उनके और भी करीब आ सकूं और गहराई तक जा सकूं।
अब मैंने खुदाई की गति को बढ़ाना शुरू किया और हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी खाई की गहराई को नापने लगा जिससे कमरे में जिस्मों के टकराने की आवाजें गूंजने लगीं। मामी हर धक्के पर मेरा नाम पुकार रही थीं और उनके रसीले तरबूज बेतरतीब तरीके से उछल रहे थे जिन्हें मैं अपने हाथों से दबाकर और भी आनंद ले रहा था। खुदाई की यह प्रक्रिया इतनी गहन और भावुक थी कि हम दोनों को समय और स्थान का कोई होश नहीं रहा और बस एक-दूसरे में पूरी तरह विलीन हो गए थे। हमारी सांसें एक-दूसरे में उलझ रही थीं और पसीने की बूंदें हमारे शरीरों को और भी चिकना बना रही थीं जिससे घर्षण का मजा और भी बढ़ गया था।
मामी ने अपनी करवट बदली और मुझे इशारा किया कि मैं उन्हें पिछवाड़े से खोदना शुरू करूं जो मेरी भी एक पुरानी फंतासी थी जिसे आज हकीकत का रूप मिल रहा था। वह बिस्तर पर घुटनों के बल बैठ गईं और अपना भारी पिछवाड़ा मेरी तरफ कर दिया जिसे देखकर मेरा खीरा और भी ज्यादा उत्तेजित होकर फन फैलाने लगा। मैंने पीछे से उनकी कमर को पकड़ा और अपने खीरे को उनकी खाई के पिछले हिस्से से सटाते हुए एक जोरदार धक्का दिया जिससे वह पूरी तरह अंदर समा गया। इस पोजीशन में खुदाई का मजा ही कुछ और था क्योंकि हर धक्के के साथ उनके तरबूज नीचे लटक रहे थे और मैं उन्हें पीछे से पकड़ कर जोर-जोर से झटके दे रहा था।
कमरे का माहौल अब पूरी तरह से भाप बन चुका था और हम दोनों ही अपने रस को छोड़ने की कगार पर पहुँच चुके थे जहाँ सुख की पराकाष्ठा हमारा इंतजार कर रही थी। मैंने अपनी गति को और भी तेज कर दिया और मामी भी नीचे से अपने पिछवाड़े को जोर-जोर से उछालने लगीं ताकि खुदाई का असर उनके रोम-रोम तक पहुँच सके। उनकी सिसकारियां अब चीखों में बदलने लगी थीं और मेरा शरीर भी पूरी तरह से अकड़ गया था क्योंकि मेरे खीरे के भीतर से रस निकलने का दबाव बहुत बढ़ गया था। अंततः एक जोरदार धक्के के साथ हम दोनों का रस एक साथ छूट गया और मेरी गर्म धाराएं उनकी खाई की गहराइयों में समा गईं जिससे हमें असीम शांति मिली।
खुदाई खत्म होने के बाद हम दोनों पसीने से लथपथ एक-दूसरे की बाहों में ढह गए और हमारी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं लेकिन उस अहसास की गर्माहट अभी बाकी थी। मामी की हालत बहुत नाजुक लग रही थी और उनके चेहरे पर एक ऐसी संतुष्टि थी जो उन्होंने शायद पहले कभी महसूस नहीं की थी और उनकी आँखों में मेरे लिए ढेर सारा प्यार था। हमने काफी देर तक एक-दूसरे को पकड़ कर रखा और उस खामोशी में ही हमने एक-दूसरे से बहुत कुछ कह दिया जो शब्दों में बयान करना मुमकिन नहीं था। वह दोपहर हमारे लिए महज एक शारीरिक संबंध नहीं बल्कि दो रूहों का मिलन बन गई थी जिसने हमारे रिश्ते को एक नई और गुप्त गहराई दे दी थी।
शाम होने को थी और सूरज ढलने लगा था लेकिन हमारे मन की आग अब एक शांत और शीतल रोशनी में बदल चुकी थी जिसने हमें अंदर से पूरी तरह तृप्त कर दिया था। हमने धीरे-धीरे अपने कपड़े पहने और घर के कामों में ऐसे लग गए जैसे कुछ हुआ ही न हो लेकिन हमारी नजरें जब भी मिलती थीं तो उनमें वही राज और शरारत नजर आती थी। वह दिन मेरी जिंदगी का सबसे यादगार दिन बन गया जिसने मुझे वयस्कता के एक ऐसे पहलू से वाकिफ कराया जो बहुत ही खूबसूरत और रसीला था। मामी आज भी जब मुझे देखती हैं तो उनकी मुस्कान में वही खुदाई की यादें ताजा हो जाती हैं जो हम दोनों के बीच हमेशा एक अनमोल राज की तरह दफन रहेंगी।