समीर और मीनाक्षी की मुलाकात करीब दस सालों के बाद उस पुराने फार्महाउस के सुनसान बगीचे में हो रही थी जहाँ कभी वे बचपन में छुपम-छुपाई खेला करते थे। मीनाक्षी अब पहले जैसी दुबली-पतली लड़की नहीं रही थी बल्कि वह एक परिपक्व और बेहद आकर्षक महिला बन चुकी थी जिसकी देह का हर कोना वासना और आकर्षण से लबालब भरा हुआ था। उसकी सिल्क की साड़ी उसके शरीर के उभारों को कुछ इस तरह से जकड़े हुए थी कि समीर की नजरें चाहकर भी उसके शरीर से हट नहीं पा रही थीं और उसके मन में पुरानी यादों के साथ-साथ एक नई और तीखी तड़प जन्म ले रही थी जो उसे अंदर तक झकझोर रही थी।
मीनाक्षी के शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी जिसमें उसके भारी और गदराए हुए तरबूज उसकी चोली के भीतर से बाहर निकलने को बेताब नजर आ रहे थे और हर सांस के साथ उनकी हलचल समीर के दिल की धड़कनें बढ़ा रही थी। उसका पिछवाड़ा काफी मांसल और गोल था जो साड़ी के महीन कपड़े के नीचे से अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहा था और समीर उसे देखते ही कल्पनाओं के समंदर में गोते लगाने लगा था। मीनाक्षी की चाल में एक ऐसी नशीली लचक थी जो किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी थी और समीर तो वैसे भी उसका पुराना दीवाना था जिसने सालों से इस लम्हे का सपना देखा था।
दोनों के बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ लेकिन उन बातों में शब्दों से ज्यादा भावनाओं और पुरानी दबी हुई चाहतों का शोर सुनाई दे रहा था और उनकी नजरें एक-दूसरे से बहुत कुछ कह रही थीं। समीर ने महसूस किया कि मीनाक्षी की सांसें भी अब भारी होने लगी थीं और उसकी आंखों में वही चमक थी जो किसी प्यासे की आंखों में पानी देख कर आती है। उनके बीच का भावनात्मक जुड़ाव इतना गहरा था कि बिना किसी शारीरिक स्पर्श के भी वे एक-दूसरे की रूह की गहराई को महसूस कर पा रहे थे और बगीचे की ठंडी हवा भी उनके बदन में आग लगा रही थी।
धीरे-धीरे आकर्षण इतना बढ़ गया कि समीर ने हिम्मत जुटाई और मीनाक्षी के मखमली हाथ को अपने हाथों में ले लिया जिससे मीनाक्षी के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई और वह सिहर उठी। उसके हाथ की कोमलता और समीर की हथेलियों की गर्माहट ने जैसे एक मूक समझौता कर लिया था कि अब आगे बढ़ने का समय आ गया है और झिझक की दीवारें धीरे-धीरे ढहने लगी थीं। मीनाक्षी ने अपनी नजरें झुका लीं लेकिन उसने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा बल्कि समीर की उंगलियों को और मजबूती से जकड़ लिया जो इस बात का इशारा था कि वह भी उतनी ही बेचैन थी।
समीर ने उसे अपनी ओर खींचा और उसकी गर्दन के पास अपनी सांसें छोड़ते हुए उसके कान के पास फुसफुसाया जिससे मीनाक्षी की कराह दबी रह गई और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। समीर के हाथों ने अब अपना रास्ता बनाना शुरू कर दिया था और वे धीरे से ऊपर चढ़ते हुए मीनाक्षी के भारी तरबूजों तक पहुँच गए जहाँ उसने साड़ी के ऊपर से ही उन्हें सहलाना शुरू किया। मीनाक्षी के मुँह से एक हल्की सी आह निकली और उसने समीर के कंधे पर अपना सिर टिका दिया जबकि समीर उसके बदन की खुशबू को अपने फेफड़ों में भर रहा था जो किसी नशे की तरह उसे और ज्यादा उत्तेजित कर रही थी।
समीर ने अब और इंतजार न करते हुए मीनाक्षी की चोली के हुक एक-एक करके खोलने शुरू कर दिए जिससे उसके दूधिया और विशाल तरबूज आजाद होकर बाहर आ गए और उन पर मौजूद मटर जैसी सख्त घुंडियाँ समीर को दावत देने लगीं। समीर ने झुककर अपने मुंह से उन मटरों को सहलाया और फिर बारी-बारी से उन तरबूजों को चूसने लगा जिससे मीनाक्षी की कमर धनुष की तरह मुड़ने लगी और वह समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उसे खुद से सटाने लगी। उसकी उत्तेजना अब सातवें आसमान पर थी और वह बार-बार समीर का नाम लेकर उसे पुकार रही थी जैसे वह उसे पूरी तरह से पा लेना चाहती हो।
अब समीर ने मीनाक्षी की साड़ी और साये को भी उतार फेंका जिससे उसकी रेशमी और गहरी खाई पूरी तरह से उजागर हो गई जिसके किनारों पर काले और घने बाल बिखरे हुए थे जो उसकी सुंदरता को और बढ़ा रहे थे। समीर ने अपनी उंगली से उसकी खाई की गहराई को टटोलना शुरू किया तो उसने पाया कि वह पहले से ही काफी गीली और चिपचिपी हो चुकी थी जो इस बात का सबूत थी कि मीनाक्षी खुदाई के लिए पूरी तरह तैयार है। मीनाक्षी ने अपने दोनों पैर फैला दिए और समीर को इशारे से अपने पास बुलाया ताकि वह अपनी इस प्यास को शांत कर सके जो सालों से उसके भीतर सुलग रही थी।
समीर ने अपना पैंट उतारा और अपना लम्बा और कड़क खीरा बाहर निकाला जो अब पूरी तरह से सीधा और कठोर हो चुका था और जिसे देखते ही मीनाक्षी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने समीर के खीरे को अपने हाथ में लिया और उसे सहलाने लगी और फिर धीरे से उसे अपने मुँह में लेकर चूसने लगी जिससे समीर के पूरे शरीर में एक सुखद सिहरन दौड़ गई। खीरा अब पूरी तरह से लार से भीग चुका था और खुदाई के लिए पूरी तरह से तैयार था जिसके बाद समीर ने मीनाक्षी को घास पर लिटाया और खुद उसके ऊपर आ गया ताकि वह अपनी मंजिल को पा सके।
समीर ने अपने खीरे की नोक को मीनाक्षी की खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से दबाव बनाया जिससे वह रेशमी दीवारें फैलने लगीं और मीनाक्षी के मुँह से एक दर्दभरी लेकिन आनंदमयी चीख निकल पड़ी। जैसे ही आधा खीरा खाई के भीतर समाया मीनाक्षी ने समीर को कसकर पकड़ लिया और अपने पैरों को उसकी कमर के चारों ओर लपेट लिया ताकि वह उसे और गहराई तक महसूस कर सके। समीर ने अब अपनी रफ्तार बढ़ानी शुरू की और जोर-जोर से खुदाई करने लगा जिससे बगीचे का वह कोना उनकी जिस्मानी आवाजों और सिसकारियों से गूंज उठा जो वातावरण को और भी ज्यादा कामुक बना रही थी।
वह सामने से खुदाई (missionary) करते हुए मीनाक्षी के तरबूजों को अपने हाथों से मसल रहा था और उसके मटरों को अपने दांतों से हल्के से काट रहा था जिससे मीनाक्षी पागल सी हो रही थी। उसने समीर को पलट दिया और खुद उसके ऊपर बैठकर उसके खीरे पर उछलने लगी जिससे खुदाई का आनंद दुगना हो गया और दोनों के शरीरों से पसीना बहकर एक-दूसरे में मिल रहा था। मीनाक्षी की आँखें ऊपर चढ़ गई थीं और वह बस एक ही लय में अपने कूल्हों को हिला रही थी जैसे वह समीर के खीरे को अपनी खाई की सबसे गहरी तह तक उतार लेना चाहती हो।
कुछ देर बाद समीर ने उसे घुमाया और उसके पिछवाड़े की तरफ से खुदाई (doggy style) शुरू की जिससे मीनाक्षी की चीखें और भी तेज हो गईं क्योंकि खीरा अब उसकी खाई के हर कोने को छू रहा था। समीर के हर धक्के के साथ मीनाक्षी के तरबूज जोर-जोर से हिल रहे थे और वह अपनी कमर को आगे-पीछे करते हुए समीर के हर प्रहार का स्वागत कर रही थी। खुदाई अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी और दोनों का शरीर थरथराने लगा था क्योंकि उनके भीतर का लावा अब बाहर निकलने के लिए पूरी तरह से तैयार था और वे एक-दूसरे को कसकर थामे हुए थे।
अंत में समीर ने एक जोरदार धक्का मारा और उसका खीरा पूरी तरह से मीनाक्षी की खाई के अंत तक पहुँच गया जहाँ उसका सारा गर्म रस छूट गया और मीनाक्षी भी उसी पल कांपते हुए अपने चरम पर पहुँच गई। मीनाक्षी की खाई से भी रस निकलने लगा और दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए जबकि उनकी सांसें अभी भी तेज थीं और दिल की धड़कनें आपस में बातें कर रही थीं। वह लम्हा जैसे थम गया था और वे दोनों बस उसी सुकून को महसूस कर रहे थे जो इस गहन खुदाई के बाद उन्हें प्राप्त हुआ था और जो उनके रिश्तों को एक नई गहराई दे गया था।
कुछ समय बाद जब वे थोड़े संभले तो मीनाक्षी समीर की छाती पर सिर रखकर लेट गई और समीर उसके गीले बालों को सहलाने लगा जबकि उनकी देह अभी भी एक-दूसरे की गर्माहट को सोख रही थी। उनके चेहरों पर एक अजीब सी संतुष्टि थी और वे जानते थे कि आज जो हुआ वह सिर्फ शरीर का मिलन नहीं था बल्कि दो रूहों की बरसों पुरानी अधूरी प्यास का बुझना था। उस दिन के बाद से उनके बीच का रिश्ता और भी गहरा हो गया और वह पुराना फार्महाउस उनकी उन अनगिनत रातों का गवाह बना जहाँ वे अक्सर अपनी दबी हुई हसरतों को खुदाई के जरिए अंजाम दिया करते थे।