दफ्तर की वो सुहानी रात और अंजलि का साथ


दफ्तर की घड़ी में रात के ग्यारह बज चुके थे और पूरे फ्लोर पर सन्नाटा पसरा हुआ था। सिर्फ मेरी डेस्क की लाइट जल रही थी और बगल के केबिन में अंजलि अभी भी अपनी फाइलों में डूबी हुई थी। प्रोजेक्ट की डेडलाइन सिर पर थी और हम दोनों ही इस काम को खत्म करने के लिए रुके हुए थे। पर सच तो यह था कि मेरा मन काम में कम और अंजलि की उन कातिल अदाओं में ज्यादा लगा हुआ था जो वह अनजाने में बिखेर रही थी। रात की तन्हाई में कंप्यूटर की नीली रोशनी उसके चेहरे पर एक जादुई चमक बिखेर रही थी।

अंजलि की उम्र लगभग 28 साल थी और उसकी देह किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी। उसने आज गहरे नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी हुई थी, जो उसके गोरे बदन पर किसी बहती नदी की तरह लिपटी हुई थी। जब वह अपनी सीट से उठी, तो साड़ी के पल्लू से झांकते उसके भारी और गोल तरबूज साफ नजर आ रहे थे, जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। साड़ी का ब्लाउज इतना तंग था कि उसके मटर जैसे उभार कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। उसकी पतली कमर और भारी पिछवाड़े का घेराव किसी भी पुरुष के मन में तूफान खड़ा करने के लिए काफी था।

हम दोनों पिछले तीन सालों से साथ काम कर रहे थे, पर आज उस दोस्ती के बीच एक अनकही प्यास जन्म ले रही थी। अंजलि मेरे केबिन में आई और कुछ फाइलों के बहाने मेरे करीब खड़ी हो गई। उसकी खुशबू मेरे नथुनों में समा गई, जो मोगरे और पसीने का एक मदहोश कर देने वाला मिश्रण था। उसने झुककर मेरी स्क्रीन की तरफ देखा, जिससे उसकी साड़ी का पल्लू नीचे गिर गया और उसकी गहरी खाई पूरी तरह से मेरे सामने नुमाया हो गई। उस गहरी घाटी को देखकर मेरे शरीर के निचले हिस्से में हलचल शुरू हो गई और मेरा खीरा धीरे-धीरे अपनी लंबाई बढ़ाने लगा।

मैंने महसूस किया कि अंजलि की नजरें भी मेरी पैंट के उस उभार पर टिकी हुई हैं। उसने अपनी आँखें ऊपर कीं और हमारी नजरें मिलीं, जिसमें डर से ज्यादा एक किस्म की दावत थी। मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी रेशमी कमर पर रखा, जहाँ उसकी त्वचा मखमली एहसास दे रही थी। अंजलि ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसने अपनी आँखें मूँद लीं और एक लंबी सांस भरी। मेरा हाथ धीरे-धीरे ऊपर सरका और मैंने साड़ी के ऊपर से ही उसके एक तरबूज को अपनी हथेली में भर लिया। वह इतनी मुलायम और गरम थी कि मेरी धड़कनें बेकाबू हो गईं।

अंजलि की सांसें अब तेज हो चुकी थीं और उसने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया। मैंने उसे अपनी बाहों में भरकर उसके होंठों को चूमना शुरू किया, और वह प्यासी हिरनी की तरह मेरा साथ देने लगी। मैंने उसे धीरे से मेज पर बैठाया और उसकी साड़ी को कमर से नीचे सरकाने लगा। जैसे ही साड़ी और पेटीकोट नीचे गिरे, उसका जन्नत जैसा शरीर मेरे सामने था। उसकी जांघों के बीच घने रेशमी बालों का एक जंगल था, जिसके पीछे उसकी गुलाबी खाई छुपी हुई थी जो अब उत्तेजना के कारण गीली होने लगी थी।

मैंने घुटनों के बल बैठकर उसकी खाई चाटना शुरू किया, जिससे अंजलि के मुँह से सिसकारियां निकलने लगीं। उसकी योनि से निकलता हुआ प्राकृतिक शहद मेरे मुँह का स्वाद बढ़ा रहा था। वह अपना पिछवाड़ा उठा-उठाकर मेरे मुँह पर दबा रही थी, जैसे वह चाहती हो कि मैं उसे पूरी तरह निगल जाऊं। फिर अंजलि ने मुझे खड़ा किया और मेरी पैंट खोलकर मेरा कड़क और प्यासा खीरा बाहर निकाल लिया। उसने उसे अपने दोनों हाथों में थामा और बड़ी कोमलता से खीरा चूसना शुरू किया। उसकी जीभ की गर्माहट और दबाव ने मुझे स्वर्ग का अनुभव करा दिया।

अब सब्र का बांध टूट चुका था। मैंने अंजलि को मेज पर उल्टा लिटाया और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू करने की ठानी। उसका भारी पिछवाड़ा हवा में ऊपर था और उसकी खाई पूरी तरह खुली हुई थी। मैंने अपने खीरे को उसकी गीली दरार पर सेट किया और एक जोरदार धक्का दिया। मेरा खीरा उसकी तंग खाई में पूरा समा गया। अंजलि के मुँह से एक तेज आह निकली और उसने मेज के कोनों को कसकर पकड़ लिया। हम दोनों के शरीर आपस में टकराने लगे और कमरे में सिर्फ थप-थप की आवाज़ गूँजने लगी।

हर धक्के के साथ मेरी खुदाई और भी गहरी होती जा रही थी। अंजलि बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी, उसके चेहरे पर असीम सुख के भाव थे। मैंने उसकी कमर पकड़कर उसे अपनी तरफ खींचा और अब हम सामने से खोदने लगे। उसके तरबूज मेरी छाती से रगड़ खा रहे थे और उनके ऊपर के मटर पूरी तरह तन चुके थे। मैंने उसकी खाई में उंगली डालकर उसे और उत्तेजित किया, जिससे वह बेतहाशा कांपने लगी। अंजलि ने अपने पैर मेरी कमर के चारों ओर लपेट लिए और मुझे अपने और करीब खींच लिया ताकि हमारा संगम और भी गहरा हो सके।

अंत में, उत्तेजना अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई। अंजलि का पूरा शरीर अकड़ गया और उसने मुझे कसकर जकड़ लिया। उसकी खाई से गरम रस छूटने लगा और ठीक उसी समय मेरे खीरे ने भी अपनी सारी ऊर्जा उसके अंदर उंडेल दी। हम दोनों पसीने से लथपथ होकर एक दूसरे की बाहों में गिर पड़े। उस रात दफ्तर की मेज पर सिर्फ काम नहीं हुआ था, बल्कि दो रूहों ने एक दूसरे को पा लिया था। अंजलि के बिखरे बाल और उसका गुलाबी चेहरा उस तृप्ति की गवाही दे रहे थे जो हमें इस खुदाई से मिली थी।