5 साल बाद मेघा से मिलना किसी सपने जैसा था। शहर के उस पुराने और सुनसान गार्डन के कोने में हम दोनों एक बेंच पर बैठे थे। शाम ढल रही थी और सूरज की नारंगी किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं, जिससे उसका गोरा रंग और भी निखर उठा था। हम पुरानी यादों में खोए थे, लेकिन माहौल में एक अजीब सी बेचैनी और गर्मी महसूस हो रही थी।
मेघा की कद-काठी अब पहले से कहीं ज्यादा आकर्षक हो गई थी। उसकी कमसिन उम्र की वो पतली लड़की अब एक भरपूर जवान औरत में तब्दील हो चुकी थी। उसके सीने पर कसे हुए दो बड़े और गोल तरबूज साफ नजर आ रहे थे, जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। उसकी पतली कमर और भारी पिछवाड़े ने मेरे मन में अजीब सी हलचल पैदा कर दी थी।
"आर्यन, तुम मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो? क्या मैं बहुत बदल गई हूँ?" उसने अपनी मखमली आवाज में पूछा और अपनी झुकी हुई पलकों को धीरे से उठाया। मैंने उसके और करीब होते हुए कहा, "बदल तो तुम गई हो मेघा, पहले से कहीं ज्यादा हसीन और नशीली हो गई हो। तुम्हें देखकर आज मेरा खुद पर काबू पाना मुश्किल हो रहा है।"
मेरी बात सुनकर उसके गाल शर्म से गुलाबी हो गए और उसने अपनी ओढ़नी को ठीक करने की नाकाम कोशिश की। उसकी यह झिझक मुझे और भी ज्यादा उकसा रही थी। हम दोनों के बीच का भावनात्मक जुड़ाव बचपन का था, लेकिन आज उस रिश्ते में कामुकता का रंग चढ़ रहा था। हमारी नजरें मिलीं और एक पल के लिए वक्त जैसे ठहर सा गया।
मैं उसकी आंखों की गहराई में उतरता चला गया। मुझे महसूस हुआ कि वह भी वही चाहती है जो मेरे मन में चल रहा था। गार्डन का वह कोना घने पेड़ों से घिरा था, जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। मैंने हिम्मत जुटाई और अपना हाथ धीरे से उसकी हथेली पर रखा। उसका शरीर एक पल के लिए कांप उठा, जैसे उसे करंट लगा हो।
"आर्यन... यहाँ कोई देख लेगा," उसने फुसफुसाते हुए कहा, लेकिन उसने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा। मैंने उसके हाथ को मजबूती से पकड़ लिया और अपनी उंगलियों को उसकी उंगलियों में फंसा दिया। उसकी हथेलियों का पसीना और उसकी बढ़ती हुई सांसें बता रही थीं कि संघर्ष सिर्फ मेरे मन में नहीं, उसके अंदर भी चल रहा था।
मैंने अपना दूसरा हाथ उसकी कमर पर रखा और उसे धीरे से अपनी ओर खींचा। वह बिना किसी विरोध के मेरे करीब आती चली गई। जब उसके उभरे हुए तरबूज मेरे सीने से टकराए, तो मेरी धड़कनें बेकाबू हो गईं। उसकी खुशबू मेरे नथुनों में भर गई थी, जो किसी महंगे इत्र से कहीं ज्यादा मादक और उत्तेजक लग रही थी।
मैंने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया और उसके माथे को चूमा। मेघा ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं और उसका चेहरा समर्पण का भाव दिखा रहा था। मैंने धीरे-धीरे नीचे उतरते हुए उसके गुलाबी होंठों को अपने होंठों की गिरफ्त में ले लिया। वह एक धीमा लेकिन गहरा चुंबन था, जिसमें सालों की तड़प छिपी हुई थी।
चुंबन के साथ ही हमारी झिझक की दीवार पूरी तरह ढह गई। मेरे हाथ अब उसके कुर्ते के नीचे पहुंच चुके थे, जहाँ उसकी रेशमी त्वचा का स्पर्श मुझे पागल कर रहा था। मैंने उसके कुर्ते के बटन एक-एक करके खोलने शुरू किए। जैसे ही कपड़ा हटा, उसके सफेद और बड़े तरबूज मेरे सामने आ गए, जिनके ऊपर लगे मटर जैसे दाने उत्तेजना से सख्त हो चुके थे।
"तुम बहुत खूबसूरत हो मेघा," मैंने भर्राई आवाज में कहा और अपने चेहरे को उसके तरबूजों के बीच ले गया। उसने एक लंबी आह भरी और मेरे सिर को अपने सीने से चिपका लिया। मेरे हाथ अब नीचे की ओर बढ़ रहे थे, उसकी पजामी के नाड़े को टटोल रहे थे। वह गार्डन की उस घास पर मेरे नीचे लेटी हुई थी, पूरी तरह से बेबस और बेकरार।
जैसे ही मैंने उसकी पजामी नीचे की, उसकी रसीली और गहरी खाई मेरे सामने उजागर हो गई। वह जगह पूरी तरह साफ थी और वहां से एक भिनी-भिनी प्राकृतिक गंध आ रही थी। मैंने अपना एक हाथ उसकी खाई पर रखा, तो वह बुरी तरह छटपटाने लगी। उसकी खाई पूरी तरह गीली हो चुकी थी, जो इस बात का सबूत था कि वह खुदाई के लिए तैयार है।
मैंने अपनी पैंट उतारी और अपना सख्त खीरा बाहर निकाला। मेरा खीरा उत्तेजना के मारे फड़फड़ा रहा था। मेघा ने जब उसे देखा, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और मेरे खीरे को सहलाने लगी। उसके कोमल स्पर्श ने मुझे और भी ज्यादा उत्तेजित कर दिया और मैं उस पर पूरी तरह से हावी हो गया।
मैंने उसे अपनी बाहों में भरकर उसके कान के पास फुसफुसाया, "तैयार हो ना?" उसने सिर्फ अपनी गर्दन हिला दी। मैंने उसे सामने से खोदने की मुद्रा में लिया और अपने खीरे का सिरा उसकी गीली खाई के द्वार पर रखा। जैसे ही मैंने थोड़ा दबाव डाला, उसने जोर से मेरा कंधा पकड़ लिया। उसकी खाई बहुत तंग थी, लेकिन पूरी तरह रस से भरी हुई थी।
धीरे-धीरे, मैंने पूरा खीरा उसकी खाई के अंदर उतार दिया। मेघा के मुँह से एक तीखी सिसकी निकली, जो गार्डन की शांति में गूंज गई। मैंने उसे चूमकर शांत किया और फिर धीमी गति से अपनी कमर चलाना शुरू किया। हर धक्के के साथ हमारा शरीर पसीने से तर-बतर हो रहा था। खुदाई की वह आवाज और उसकी सिसकियां मुझे चरम आनंद दे रही थीं।
कुछ देर सामने से खोदने के बाद, मैंने उसे पलटने का इशारा किया। अब वह अपने घुटनों के बल थी और उसका भारी पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठा हुआ था। मैंने उसे पीछे से पकड़ा और फिर से खुदाई शुरू की। पिछवाड़े से खोदना उसे और भी ज्यादा आनंद दे रहा था। वह बेड की जगह घास पर अपने हाथों को जमाए हुए थी और हर धक्के का स्वागत कर रही थी।
हमारी सांसों की रफ्तार अब अपनी चरम सीमा पर थी। मुझे महसूस हुआ कि मेरा रस अब निकलने ही वाला है। मेघा भी बुरी तरह कांप रही थी और उसकी खाई से भी रस छूटने लगा था। मैंने उसे कसकर अपनी बाहों में जकड़ा और आखिरी कुछ जोरदार धक्के लगाए। एक साथ हम दोनों का रस छूटा और हम दोनों निढाल होकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े।
कुछ देर तक हम वैसे ही पड़े रहे, एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस करते हुए। पसीने से लथपथ हमारे शरीर अब शांत हो रहे थे। मेघा की आंखों में एक अलग सी चमक और संतुष्टि थी। हमने धीरे-धीरे अपने कपड़े ठीक किए। वह शाम हमारी दोस्ती के एक नए अध्याय की शुरुआत थी, जहाँ भावनाओं के साथ-साथ जिस्मों का मिलन भी मुकम्मल हुआ था।
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