पड़ोसन की रसीली चुदाई--->मीरा की उम्र कोई बत्तीस के आसपास रही होगी, लेकिन उसका यौवन किसी कच्ची कली की तरह आज भी खिला हुआ था। उसकी चाल में एक ऐसी मादकता थी कि जब वो चलती तो उसके भारी-भरकम तरबूज अपनी जगह से हिलकर सामने वाले का दिल धड़का देते थे। आज उसने एक गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जो उसके दूधिया जिस्म पर किसी रात के साये की तरह लिपटी हुई थी। उसने अपने बालों को ढीला बांधा हुआ था, जिससे उसकी गर्दन की सुराहीदार बनावट साफ नजर आ रही थी और वहां से उठती पसीने की हल्की खुशबू समीर के नथुनों को बेचैन कर रही थी। समीर जो पेशे से एक दर्जी था, उसने आज तक इतनी खूबसूरत और आकर्षक औरत को इतनी करीब से नहीं देखा था, उसके कमरे की मद्धम रोशनी में मीरा की त्वचा सोने की तरह चमक रही थी और उसका हर अंग एक अलग ही कहानी बयां कर रहा था।
मीरा के शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, जिसमें उभार और ढलान का ऐसा संगम था कि देखने वाला बस देखता ही रह जाए। उसके तरबूज इतने बड़े और सख्त थे कि ब्लाउज का कपड़ा उन्हें मुश्किल से ढक पा रहा था, और उन पर उभरे नन्हे मटर साड़ी के पतले पल्ले के नीचे से भी अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। उसकी कमर इतनी पतली थी कि कोई भी उसे अपनी एक बांह में भर ले, लेकिन उसके नीचे का पिछवाड़ा इतना भरा हुआ और गद्देदार था कि हर बार उसके चलने पर वो पीछे से एक लय में थिरकता था। समीर ने जब पहली बार मीरा को इतने करीब खड़ा देखा, तो उसके मन में एक अजीब सी हलचल मच गई, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो नाप लेने के लिए टेप उठाए या बस खड़ा होकर इस कुदरत के करिश्मे को निहारता रहे।
दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता और भावनात्मक खिंचाव उसी पल पैदा हो गया था जब उनकी नजरें पहली बार मिली थीं। मीरा के पति शहर से बाहर रहते थे और वह अक्सर अकेली महसूस करती थी, जबकि समीर की सादगी और उसकी आंखों में छिपी भूख मीरा को अपनी ओर खींच रही थी। कमरे में सिलाई मशीन की आवाज बंद थी और चारों तरफ सिर्फ उन दोनों की सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। समीर ने जब कांपते हाथों से इंची टेप उठाया, तो उसे अहसास हुआ कि आज की शाम कुछ अलग होने वाली है। मीरा भी समीर की नजरों के तपिश को महसूस कर रही थी, उसकी धड़कनें तेज थीं और उसकी गर्दन पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमकने लगी थीं, जो उसके मन में चल रहे द्वंद्व और दबी हुई इच्छाओं का प्रमाण थीं।
समीर धीरे से मीरा के पीछे खड़ा हुआ और जब उसने उसकी पीठ का नाप लेने के लिए हाथ बढ़ाया, तो उसकी उंगलियां गलती से मीरा की ठंडी त्वचा को छू गईं। उस एक स्पर्श ने जैसे बिजली का करंट पैदा कर दिया हो, मीरा के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई और उसने धीरे से अपनी आंखें मूंद लीं। समीर ने महसूस किया कि मीरा ने विरोध करने के बजाय अपनी गर्दन एक तरफ झुका दी है, जैसे वो उसे और करीब आने का मूक निमंत्रण दे रही हो। समीर का दिल अब सीने से बाहर आने को बेताब था, उसकी आंखों में हवस की जगह एक गहरा अनुराग और चाहत थी। उसने धीरे से टेप को मीरा के तरबूजों के ऊपर से घुमाया, और इस बार उसने जानबूझकर अपनी हथेलियों को उन नर्म गोलों पर टिकने दिया, जिससे मीरा के मुंह से एक दबी हुई आह निकल गई।
झिझक अब धीरे-धीरे कम हो रही थी और मन का संघर्ष अपनी अंतिम सांसे ले रहा था, क्योंकि शरीर की पुकार आत्मा की आवाज से कहीं ज्यादा बुलंद हो चुकी थी। समीर ने अपनी हिम्मत जुटाई और मीरा के कानों के पास जाकर फुसफुसाया कि वो बहुत खूबसूरत लग रही है। मीरा ने पलटकर समीर की आंखों में देखा, उसकी आंखों में भी अब वही आग थी जो समीर को जला रही थी। उसने समीर का हाथ पकड़कर अपने एक तरबूज पर रख दिया और उसे जोर से दबाने का इशारा किया। उस स्पर्श में सालों की प्यास और अधूरापन छिपा था, समीर ने अपनी उंगलियों से उन मटर जैसे निप्पलों को सहलाना शुरू किया तो मीरा की कमर धनुष की तरह मुड़ गई और उसने समीर को अपनी बांहों में जकड़ लिया।
पहला असली स्पर्श अब एक जुनून में बदल चुका था, समीर ने मीरा के होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उनका फूलों का मिलन इतना गहरा था कि दोनों एक-दूसरे की सांसें पीने लगे। समीर के हाथ अब मीरा की साड़ी की तहों को खोल रहे थे, और जैसे ही नीला रेशम जमीन पर गिरा, मीरा का दूधिया बदन समीर के सामने पूरी तरह नुमाया हो गया। उसके भारी तरबूज अब बिना किसी बंधन के लहरा रहे थे और उनके ऊपर के मटर ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह सख्त हो चुके थे। समीर ने झुककर उन मटरों को अपने मुंह में लिया और मीरा के शरीर का कंपन और बढ़ गया, उसने समीर के बालों को अपनी उंगलियों में फंसा लिया और उसे अपने करीब खींचने लगी, जैसे वो उसे अपने भीतर समा लेना चाहती हो।
जैसे-जैसे उत्तेजना बढ़ी, समीर ने अपने कपड़े उतार फेंके और उसका कड़क खीरा अब अपनी मंजिल तलाशने लगा था। मीरा ने जब समीर के खीरे को देखा, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई, वो इतना लंबा और मोटा था कि उसे देखकर ही मीरा की खाई गीली होने लगी थी। समीर ने मीरा को मेज पर लिटाया और उसके दोनों पैरों को फैलाकर उस गहरी और रसीली खाई का दीदार किया, जिसमें से अब रस की बूंदें टपक रही थीं। समीर ने पहले अपनी जुबान से उस खाई को चाटना शुरू किया, मीरा बिस्तर पर तड़पने लगी और उसके हाथ मेज के कोनों को कसकर पकड़ने लगे। उसकी सिसकारियां अब कमरे की दीवारों से टकराकर वापस आ रही थीं, और वो बार-बार समीर को खोदने के लिए कह रही थी।
समीर ने अब और इंतजार करना मुनासिब नहीं समझा, उसने अपने खीरे को मीरा की खाई के मुहाने पर रखा और एक गहरा धक्का लगाया। जैसे ही खीरा उस तंग और गर्म खाई के अंदर गया, मीरा की एक चीख निकल गई लेकिन वो चीख दर्द की नहीं बल्कि एक असीम आनंद की थी। समीर ने धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाई और सामने से खुदाई का खेल शुरू कर दिया, हर धक्के के साथ मीरा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके शरीर के टकराने की आवाज कमरे में गूंज रही थी। मीरा ने अपने पैरों को समीर की कमर के चारों तरफ लपेट लिया ताकि वो उस खीरे को अपने भीतर और गहराई तक महसूस कर सके। हर धक्के के साथ समीर मीरा की गहराई नाप रहा था और मीरा बस अपनी सांसों में उसका नाम जप रही थी।
खुदाई का खेल अब अपने चरम पर था, समीर ने मीरा को पलटा और उसे घुटनों के बल खड़ा कर दिया। पिछवाड़े से खुदाई करते समय समीर को एक अलग ही नजारा दिख रहा था, मीरा का भारी पिछवाड़ा हर धक्के के साथ हिल रहा था और उसका खीरा बार-बार उस तंग खाई में जाकर उसे तृप्त कर रहा था। मीरा अब पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थी, वह अपने सिर को बिस्तर पर पटक रही थी और उसके मुंह से गंदी-गंदी बातें निकल रही थीं जो उस पल को और भी कामुक बना रही थीं। समीर ने अपने हाथों से उसके तरबूजों को पीछे से पकड़ रखा था और अपनी पूरी ताकत से उसे खोद रहा था। कमरे का तापमान बढ़ चुका था और दोनों पसीने से तर-बतर हो चुके थे, लेकिन उनकी प्यास बुझने का नाम नहीं ले रही थी।
अंत में जब दोनों का धैर्य जवाब दे गया, तो समीर ने अपनी गति को और तेज कर दिया और मीरा की खाई के भीतर अपने खीरे को जड़ तक उतार दिया। मीरा का पूरा बदन कांपने लगा और उसकी खाई ने समीर के खीरे को कसकर जकड़ लिया। समीर का भी रस छूटने लगा और उसने अपना सारा गर्म रस मीरा की गहराई में उड़ेल दिया। मीरा ने भी अपना रस निकाल दिया और वो निढाल होकर समीर के ऊपर गिर पड़ी। दोनों के शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए थे और उनकी धड़कनें एक लय में चल रही थीं। उस पल के बाद की शांति बहुत सुकून देने वाली थी, मीरा की आंखों में एक संतुष्टि थी जो उसने सालों से महसूस नहीं की थी। समीर ने उसे अपने सीने से लगा लिया और दोनों उसी हालत में देर तक लेटे रहे, उस अनकहे और रसीले पल को महसूस करते हुए।
पूरी खुदाई खत्म होने के बाद मीरा की हालत ऐसी थी जैसे किसी ने उसे पूरी तरह निचोड़ दिया हो, उसके बाल बिखरे हुए थे और उसके चेहरे पर एक अलग ही नूर चमक रहा था। उसने समीर के माथे को चूमा और बिना कुछ कहे अपनी साड़ी समेटने लगी, लेकिन उसकी चाल में अब एक अलग ही आत्मविश्वास और थकावट का मिश्रण था। समीर ने उसे जाते हुए देखा और उसे अहसास हुआ कि ये सिर्फ एक जिस्मानी रिश्ता नहीं था, बल्कि दो तन्हा रूहों का मिलन था। उस शाम के बाद से समीर के कमरे की वो मेज और सिलाई की मशीनें एक राज की गवाह बन गई थीं, जिसे सिर्फ वो दोनों जानते थे। मीरा अब अक्सर नाप देने के बहाने आती थी और हर बार वो खुदाई का खेल और भी गहरा और रसीला होता चला गया।