दोपहर की तपती धूप ने गली की रौनक को पूरी तरह से सोख लिया था, हर तरफ एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। रोहन अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ा बाहर की वीरान सड़क को देख रहा था, लेकिन उसका मन कहीं और ही भटक रहा था। घर में आज सन्नाटा था क्योंकि मम्मी-पापा एक करीबी रिश्तेदार की शादी में दूसरे शहर गए हुए थे।
रोहन की मौसी, सुनीता, पिछले दो दिनों से उनके घर रुकी हुई थीं और आज घर में वह दोनों अकेले थे। सुनीता मौसी की उम्र करीब 38 साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट किसी 22 साल की जवान लड़की को भी मात देती थी। उनका गेहुआं रंग और भरा हुआ बदन रोहन के मन में हलचल पैदा कर देता था। वह जब भी चलती थीं, उनके शरीर के उतार-चढ़ाव रोहन की धड़कनें बढ़ा देते थे।
सुनीता मौसी ने उस दिन एक हल्की बैंगनी रंग की साड़ी पहनी हुई थी, जो उनके शरीर पर बिल्कुल चिपकी हुई थी। उनके उभरे हुए 'तरबूज' साड़ी के पल्लू से झांकने को बेताब लग रहे थे। रोहन ने कई बार चोरी-छिपे उन्हें देखा था, लेकिन आज की तन्हाई ने उसके अंदर के सोए हुए अरमानों को जगा दिया था। वह अपनी भावनाओं और हवस के बीच झूल रहा था।
किचन से आती खटर-पटर की आवाज ने रोहन का ध्यान खींचा। वह धीरे से दबे पांव किचन की तरफ बढ़ा और वहां का नजारा देखकर उसकी सांसें अटक गईं। मौसी स्लैब पर झुककर कुछ ढूंढ रही थीं, जिससे उनका 'पिछवाड़ा' साड़ी में कस गया था और उसकी गोलाई साफ नजर आ रही थी। रोहन की नजरें उनके उस भारी हिस्से पर टिक गईं और उसका 'खीरा' पैंट के अंदर अंगड़ाई लेने लगा।
सुनीता मौसी अचानक मुड़ीं और रोहन को वहां खड़ा देखकर थोड़ा सकपका गईं, लेकिन फिर उन्होंने मुस्कुराकर अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया। उनकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जो शायद रोहन की बेताबी को भांप चुकी थी। "रोहन, तुम यहां क्या कर रहे हो? प्यास लगी है क्या?" उन्होंने अपनी मखमली आवाज में पूछा, जिसने रोहन के कान में शहद घोल दिया।
रोहन ने हकलाते हुए कहा, "जी मौसी, बस थोड़ा पानी चाहिए था।" वह उनके इतने करीब था कि उनके बदन से आती सौंधी खुशबू उसे मदहोश कर रही थी। मौसी ने फ्रिज से पानी की बोतल निकाली और जैसे ही वह उसे देने के लिए आगे बढ़ीं, रोहन का हाथ जानबूझकर उनकी उंगलियों से छू गया। वह स्पर्श बिजली के झटके जैसा था, जिससे दोनों के बीच एक अनकहा संवाद शुरू हो गया।
मौसी ने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन उन्होंने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा। कमरे में उमस बढ़ती जा रही थी और पंखे की हवा भी अपर्याप्त लग रही थी। रोहन ने हिम्मत जुटाई और धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा। "मौसी, आज बहुत गर्मी है न?" उसकी आवाज में एक भारीपन था। सुनीता ने गहरी सांस ली, जिससे उनके 'तरबूज' साड़ी के अंदर जोर-जोर से ऊपर-नीचे होने लगे।
"हां रोहन, गर्मी तो बहुत है, बर्दाश्त के बाहर होती जा रही है," मौसी ने धीरे से कहा और रोहन की आंखों में झांका। उस पल साड़ी का पल्लू उनके कंधे से फिसल गया, जिससे उनकी 'खाई' की गहराई साफ दिखने लगी। रोहन अब खुद पर काबू नहीं रख पा रहा था। उसने धीरे से अपना हाथ उनकी कमर के खुले हिस्से पर रखा, जहां की त्वचा मखमल जैसी कोमल थी।
सुनीता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई, लेकिन उन्होंने उसे रोका नहीं। रोहन ने अपनी उंगलियों को उनकी कमर पर धीरे-धीरे फेरना शुरू किया। मौसी की सांसें तेज चलने लगीं और उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं। "रोहन, यह तुम क्या कर रहे हो? हम दोनों का रिश्ता..." वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाईं क्योंकि रोहन ने अपनी उंगली उनके होठों पर रख दी थी।
"रिश्ते अपनी जगह हैं मौसी, लेकिन यह अहसास बहुत सच्चा है," रोहन ने फुसफुसाते हुए कहा। उसने उन्हें धीरे से अपनी ओर खींचा और उनके गले पर अपने होठ रख दिए। सुनीता के मुंह से एक दबी हुई आह निकली और उन्होंने रोहन के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं। झिझक की दीवार अब धीरे-धीरे ढह रही थी और कामुकता अपना रंग दिखा रही थी।
रोहन ने उन्हें उठाकर कमरे की ओर ले जाना शुरू किया। मौसी का भारी शरीर उसके हाथों में एक सुखद अहसास दे रहा था। कमरे में पहुंचते ही उसने उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया। दोपहर की मद्धम रोशनी खिड़की के पर्दों से छनकर उनके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे वह और भी कयामत लग रही थीं। रोहन ने धीरे-धीरे उनकी साड़ी की पिन खोली और पल्लू को पूरी तरह हटा दिया।
उनके ब्लाउज के अंदर कैद 'तरबूज' जैसे बाहर आने को छटपटा रहे थे। रोहन ने उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। जैसे ही आखिरी हुक खुला, उनके दूधिया सफेद अंग सामने आ गए। उनके 'मटर' ठंड और उत्तेजना की वजह से सख्त हो चुके थे। रोहन ने झुककर एक 'तरबूज' को अपने मुंह में भर लिया और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगा। सुनीता ने अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया।
मौसी के हाथ अब रोहन की शर्ट के बटन खोल रहे थे। उन्होंने रोहन की कसरती छाती को महसूस किया और उनके नाखूनों ने उसकी पीठ पर निशान छोड़ दिए। "ओह रोहन, तुम बहुत तड़पा रहे हो," उन्होंने सिसकते हुए कहा। रोहन ने नीचे झुककर उनकी साड़ी और पेटीकोट को उनके पैरों से बाहर निकाल दिया। अब वह सिर्फ अपनी छोटी सी जांघिया में थीं, जो उनकी 'खाई' को ढके हुए थी।
रोहन ने अपनी पैंट उतार फेंकी और उसका 'खीरा' अब पूरी तरह से तना हुआ और सलाम करने को तैयार था। मौसी की नजरें जब उस पर पड़ीं, तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर उस गर्म अंग को छुआ। रोहन को लगा जैसे उसके शरीर में आग लग गई हो। उसने मौसी की टांगों को फैलाया और उनकी 'खाई' के पास अपनी उंगलियां ले गया।
उनकी 'खाई' अब पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां से निकलता रस रोहन की उंगलियों को फिसला रहा था। "मौसी, आप तो बहुत प्यासी हैं," रोहन ने चुटकी लेते हुए कहा। सुनीता ने शरमाते हुए अपना चेहरा तकिये में छुपा लिया। रोहन ने उनकी जांघिया को भी हटा दिया और अब उनकी 'खाई' के पास मौजूद 'बालों' को अपनी उंगलियों से सहलाने लगा।
उसने झुककर अपनी जुबान से उनकी 'खाई' को चाटना शुरू किया। सुनीता बिस्तर पर तड़पने लगीं, उनका शरीर धनुष की तरह ऊपर की ओर उठ रहा था। "आह... रोहन... वहां नहीं... बहुत अजीब लग रहा है... छोड़ो मत," वह बेतरतीब तरीके से बोल रही थीं। रोहन का 'खीरा' अब अंदर जाने के लिए बेताब था, लेकिन वह इस पल को और भी लंबा खींचना चाहता था।
मौसी ने रोहन को ऊपर खींचा और उसके होठों को चूमने लगीं। उनकी जुबानें आपस में गुत्थमगुत्था हो रही थीं। रोहन ने उन्हें घुमाया और उन्हें बिस्तर पर उल्टा लिटा दिया। उनका 'पिछवाड़ा' अब हवा में उठा हुआ था और किसी पहाड़ी जैसा लग रहा था। रोहन ने अपने हाथों से उन भारी चूतड़ों को सहलाया और उनके बीच अपनी उंगली डाली, जिससे सुनीता जोर से सिसक उठीं।
"अब और नहीं मौसी, अब खुदाई का वक्त है," रोहन ने कहा और उनके पीछे घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपने 'खीरे' को उनकी 'खाई' के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में आधा अंदर धकेल दिया। सुनीता के मुंह से एक चीख निकली जो तकिये में दब गई। उनकी 'खाई' बहुत तंग थी और रोहन को अंदर जाने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी।
रोहन ने धीरे-धीरे अपनी कमर हिलाना शुरू किया। हर धक्के के साथ वह और गहराई में जा रहा था। मौसी का पूरा शरीर झटके खा रहा था और उनके 'तरबूज' बिस्तर पर दबकर और भी चौड़े हो रहे थे। कमरे में सिर्फ मांस से मांस टकराने की 'चप-चप' की आवाज गूंज रही थी। रोहन अब पूरी रफ्तार से 'खुदाई' कर रहा था, और मौसी हर धक्के का मजा ले रही थीं।
कुछ देर तक पीछे से खोदने के बाद, रोहन ने उन्हें सीधा लिटाया। उसने उनकी टांगों को अपने कंधों पर रखा और फिर से सामने से 'खुदाई' शुरू कर दी। सुनीता की आंखें ऊपर चढ़ गई थीं और उनके हाथ बिस्तर की चादर को कसकर जकड़े हुए थे। "रोहन... मुझे खत्म कर दो... मेरा रस छूटने वाला है," वह जोर-जोर से चिल्लाने लगीं। रोहन ने अपनी गति और बढ़ा दी।
रोहन को भी महसूस हुआ कि उसका 'खीरा' अब फटने वाला है। उसने आखिरी कुछ जोरदार धक्के लगाए और अपना सारा गर्म लावा मौसी की 'खाई' की गहराइयों में छोड़ दिया। उसी पल सुनीता का शरीर भी कांप उठा और उनका 'रस' भी छूट गया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी सांसें इतनी तेज थीं जैसे कोई दौड़ लगाकर आए हों।
कमरे में अब एक अजीब सी शांति थी, लेकिन यह शांति संतोष की थी। सुनीता मौसी ने रोहन के माथे को चूमा और उसे अपने सीने से लगा लिया। उनकी त्वचा पसीने से तर थी और एक-दूसरे के जिस्म की महक उन दोनों के बीच के नए रिश्ते की गवाही दे रही थी। वह दोपहर सिर्फ एक शारीरिक संबंध नहीं, बल्कि भावनाओं और दबी हुई इच्छाओं का एक सैलाब थी।
रोहन को अपनी मौसी की गोद में एक सुकून महसूस हो रहा था, जो उसने पहले कभी नहीं जाना था। सुनीता भी अब पूरी तरह शांत थीं, उनके चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति थी जो बरसों की प्यास बुझने के बाद आती है। उन्होंने रोहन की आंखों में देखते हुए कहा, "आज जो हुआ, वह हमेशा हमारे बीच एक राज रहेगा।" रोहन ने बस मुस्कुराकर उनकी बात का समर्थन किया और फिर से उनके साथ लिपट गया।
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