रोहन अपनी कॉलेज की छुट्टियां बिताने के लिए अपनी मामी सुलेखा के घर आया हुआ था। सुलेखा मामी की उम्र करीब पैंतीस साल थी और उनके शरीर की बनावट किसी को भी दीवाना बनाने के लिए काफी थी। उनका कद मध्यम था लेकिन उनके शरीर के उभार बेहद आकर्षक और भरे हुए थे। मामाजी अक्सर अपने व्यापार के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहा करते थे।
मामी के पास रहने के दौरान रोहन ने गौर किया कि उनकी सादगी में भी एक अजीब सी कशिश थी। वह जब भी रसोई में काम करतीं, उनकी सूती साड़ी उनके बदन से चिपक जाती थी। उनके उभरे हुए तरबूज साड़ी के भीतर से अपनी मौजूदगी का अहसास कराते थे। रोहन अक्सर उन्हें चोरी-छिपे देखा करता था और उसके मन में अजीब सी हलचल होने लगती थी।
सुलेखा मामी भी रोहन की मौजूदगी का लुत्फ उठा रही थीं, क्योंकि घर में वह अक्सर अकेली और तन्हा महसूस करती थीं। रोहन का सुडौल शरीर और उसकी जवान आंखें उन्हें अपनी ओर खींचती थीं। दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता पनप रहा था, जिसमें शब्दों से ज्यादा खामोशियों और नजरों का खेल चल रहा था। एक-दूसरे को देख कर नजरें चुराना अब रोज की बात हो गई थी।
एक दोपहर जब बाहर तेज धूप थी और घर के अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था, सुलेखा मामी अपने कमरे में आराम कर रही थीं। रोहन पानी पीने के बहाने उनके कमरे के पास से गुजरा तो उसने देखा कि मामी की साड़ी का पल्लू सरक गया था। उनके गोरे पेट और गहरी नाभि को देखकर रोहन के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई और उसका खीरा अकड़ने लगा।
रोहन वहीं खड़ा होकर उनके बदन की खूबसूरती को निहारने लगा, उसके मन में एक तरफ झिझक थी और दूसरी तरफ तीव्र आकर्षण। वह सोच रहा था कि क्या यह सही है, लेकिन उसका मन पूरी तरह से उन पर लट्टू हो चुका था। तभी अचानक सुलेखा मामी की आंखें खुल गईं और उन्होंने रोहन को खुद को निहारते हुए पकड़ लिया, लेकिन उन्होंने नाराजगी नहीं जताई।
मामी की आंखों में गुस्सा होने के बजाय एक अजीब सी चमक और आमंत्रण था, जिसने रोहन की हिम्मत बढ़ा दी। उन्होंने धीरे से अपनी साड़ी को ठीक किया और रोहन को अपने पास बैठने का इशारा किया। रोहन के दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं और उसके हाथ-पैर कांपने लगे थे। वह धीरे से उनके बिस्तर के पास जाकर बैठ गया।
सुलेखा मामी ने धीरे से अपना हाथ रोहन के कंधे पर रखा, जिससे उसे करंट सा महसूस हुआ। उनके स्पर्श में एक ऐसी तड़प थी जिसे रोहन ने पहले कभी महसूस नहीं किया था। "क्या देख रहे थे रोहन?" मामी ने धीमी और मदहोश आवाज में पूछा। रोहन के पास कोई जवाब नहीं था, बस उसकी सांसें तेज चलने लगी थीं और पसीना आने लगा था।
रोहन ने हिम्मत जुटाकर मामी के हाथ पर अपना हाथ रखा और महसूस किया कि उनकी त्वचा कितनी नरम और गर्म थी। धीरे-धीरे उसने अपना हाथ ऊपर की ओर सरकाया और उनके कंधे को सहलाने लगा। सुलेखा मामी ने अपनी आंखें बंद कर लीं और एक लंबी आह भरी, जिससे यह साफ था कि वह भी इस स्पर्श की प्यासी थीं।
धीरे-धीरे रोहन का हाथ उनके चेहरे पर आया और उसने उनके होठों को सहलाना शुरू किया। दोनों के बीच की झिझक अब पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। सुलेखा मामी ने रोहन को अपनी ओर खींचा और उसे गले लगा लिया। रोहन को अपने सीने पर उनके भारी और नरम तरबूजों का दबाव महसूस हुआ, जिससे उसकी उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुंच गई।
रोहन ने धीरे से मामी के ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किए, उसके हाथ थरथरा रहे थे लेकिन चाहत उन पर हावी थी। जैसे ही ब्लाउज खुला, उनके गोरे और विशाल तरबूज रोहन की आंखों के सामने आ गए। उनके बीच में दबे हुए छोटे मटर जैसे दाने उत्तेजना से सख्त हो गए थे। रोहन ने अपनी जीभ से उन मटरो को सहलाना शुरू किया।
सुलेखा मामी का पूरा शरीर कांपने लगा और उन्होंने रोहन के बालों को कसकर पकड़ लिया। उनके मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं जो कमरे के सन्नाटे को चीर रही थीं। रोहन ने अब उनके तरबूजों को अपने मुंह में भर लिया और उन्हें चूसने लगा, जिससे मामी के शरीर में लहरें उठने लगीं। वह बार-बार रोहन का नाम पुकारने लगी थीं।
मामी ने रोहन की पेंट की जिप खोली और उसके सख्त हो चुके खीरे को बाहर निकाला। उसे देखते ही मामी की आंखें फटी रह गईं, वह काफी बड़ा और गर्म था। उन्होंने बिना देर किए उसे अपने हाथों में लिया और सहलाने लगीं। फिर उन्होंने धीरे से उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसना शुरू कर दिया, जिससे रोहन को स्वर्ग जैसा सुख मिलने लगा।
रोहन ने अब मामी की पेटीकोट की डोरी खींच दी और उनकी साड़ी पूरी तरह से हटा दी। उनके पैरों के बीच की गहरी खाई अब साफ दिख रही थी, जहां घने काले बाल मौजूद थे। उस खाई से कामवासना का रस बह रहा था जो इस बात का सबूत था कि मामी कितनी ज्यादा उत्तेजित हो चुकी थीं। रोहन ने वहां अपनी उंगलियां फेरना शुरू किया।
सुलेखा मामी बिस्तर पर लेट गईं और अपनी टांगें फैला दीं, जिससे उनकी खाई पूरी तरह से खुल गई। रोहन ने झुककर अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया। मामी का शरीर धनुष की तरह मुड़ गया और वह जोर-जोर से सिसकने लगीं। उनकी खाई का स्वाद रोहन को और भी ज्यादा दीवाना बना रहा था, वह पागलों की तरह उसे चाट रहा था।
जब बर्दाश्त की सीमा पार हो गई, तो रोहन ने अपने खीरे को मामी की खाई के मुहाने पर टिका दिया। उसने धीरे से दबाव डाला और महसूस किया कि वह खाई कितनी तंग और रसीली थी। सुलेखा मामी ने रोहन की कमर को अपने पैरों से जकड़ लिया और उसे अंदर धकेलने का इशारा किया। रोहन ने एक झटके में अपना आधा खीरा अंदर डाल दिया।
मामी के मुंह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम सुख की थी। रोहन ने अब लयबद्ध तरीके से सामने से खुदाई शुरू कर दी। हर धक्के के साथ मामी के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके शरीर से पसीना बह रहा था। कमरे में केवल उनके बदन के टकराने की आवाजें और उनकी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं।
रोहन ने अब मामी को घुमाया और उन्हें बिस्तर पर घुटनों के बल झुका दिया। पीछे से देखने पर उनके बड़े पिछवाड़े किसी पहाड़ की तरह लग रहे थे। रोहन ने उनके पिछवाड़े को जोर से सहलाया और फिर पीछे से खुदाई शुरू कर दी। यह अंदाज मामी को और भी ज्यादा पसंद आया और वह जोर-जोर से बिस्तर पर अपना सिर पटकने लगीं।
खुदाई की रफ्तार अब तेज हो गई थी, दोनों ही अपनी सुध-बुध खो चुके थे। रोहन का खीरा पूरी तरह से अंदर-बाहर हो रहा था और मामी की खाई पूरी तरह से रसीली हो चुकी थी। तभी अचानक सुलेखा मामी का पूरा शरीर अकड़ गया और उनकी खाई से ढेर सारा रस छूटने लगा। वह चरमानंद की स्थिति में पहुंच चुकी थीं और रोहन को कसकर थाम लिया।
रोहन ने भी अपनी रफ्तार बढ़ाई और कुछ ही पलों के बाद उसका भी रस छूटने लगा, जो मामी की गहराईयों में जाकर समा गया। दोनों पसीने से लथपथ होकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े। उनके बीच का संघर्ष और प्यास अब शांत हो चुकी थी, लेकिन उनके मन में एक नया और गहरा जुड़ाव पैदा हो गया था।
काफी देर तक दोनों खामोश लेटे रहे, बस एक-दूसरे की धड़कनों को सुन रहे थे। सुलेखा मामी ने रोहन के माथे को चूमा और मुस्कुरा दीं। वह एक ऐसी दोपहर थी जिसने उन दोनों की जिंदगी और उनके रिश्ते को हमेशा के लिए बदल दिया था। उस कमरे की दीवारों ने उस दिन एक ऐसी कहानी देखी थी जो शायद कभी किसी को पता न चले।
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