विधवा नीलम की खुदाई


नीलम दीदी मेरे पड़ोस में रहती थीं, उनके पति को गुजरे दो साल हो चुके थे। वो अकेली ही रहती थीं और अक्सर शाम को अपनी बालकनी में खड़ी होकर नीचे सड़क पर आते-जाते लोगों को देखती रहती थीं। मैं जब भी कॉलेज से आता, वो मुझे देख कर मुस्कुरा देती थीं। उनकी उस मुस्कुराहट में एक अजीब सी तड़प और खालीपन झलकता था जिसे शायद मैं ही महसूस कर पा रहा था। उस दिन गर्मी बहुत ज्यादा थी और बिजली कटी हुई थी, मैं पानी की बोतल भरने के बहाने उनके घर चला गया क्योंकि हमारे घर का फिल्टर खराब था।

नीलम दीदी का शरीर किसी तराशी हुई मूर्ति जैसा था, उनका रंग दूध जैसा गोरा था। उनके कुर्ते के अंदर छिपे हुए भारी तरबूज हमेशा ही मेरी नजरों को अपनी ओर खींचते थे। जब वो चलती थीं तो उनके तरबूज हल्की सी हलचल करते थे जो किसी भी मर्द का मन डोलने के लिए काफी थे। उनका पिछवाड़ा भी काफी चौड़ा और मांसल था जो टाइट सलवार में अपनी पूरी आकृति साफ दिखाता था। उनकी कमर पतली थी लेकिन उनके अंगों का उभार किसी को भी मदहोश करने के लिए पर्याप्त था।

जब मैं उनके घर पहुँचा तो वो सोफे पर लेटी हुई थीं, पसीने की छोटी-छोटी बूंदें उनके गले और उनके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी में चमक रही थीं। उन्होंने मुझे देखा और उठकर बैठ गईं, उनके कुर्ते का गला थोड़ा ढीला था जिससे उनके मटर जैसे दाने साफ़ झलक रहे थे। मेरी धड़कनें तेज हो गईं और मैं अपनी नजरें उनके शरीर से हटा नहीं पा रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या बात है, और मेरी आवाज गले में ही अटक गई, बस इतना कह पाया कि पानी चाहिए था।

उन्होंने मुझे पानी दिया और फिर मेरा हाथ पकड़कर अपने पास सोफे पर बिठा लिया। उनके स्पर्श में एक बिजली सी थी जिसने मेरे पूरे शरीर में करंट दौड़ दिया। हमारा स्पर्श धीरे-धीरे एक खिंचाव में बदलने लगा, मैंने महसूस किया कि वो भी इस अकेलेपन से थक चुकी थीं। उनकी सांसें तेज होने लगीं और वो धीरे से मेरे करीब आ गईं। मैंने उनकी आँखों में देखा तो वहाँ सिर्फ और सिर्फ प्यास नजर आ रही थी, एक ऐसी खुदाई की प्यास जो बरसों से दबी हुई थी।

मैंने धीरे से अपना हाथ उनके कंधे पर रखा और उन्हें अपनी ओर खींचा, उन्होंने कोई विरोध नहीं किया बल्कि अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। मैंने उनके बालों को सहलाया और फिर धीरे से उनके होठों का रसपान करने लगा। हमारा यह मिलन बहुत ही कोमल लेकिन कामुक था, जैसे दो प्यासे रेगिस्तान में बारिश की बूंदों का इंतजार कर रहे हों। मेरी उंगलियां उनके कुर्ते के ऊपर से ही उनके विशाल तरबूजों को सहलाने लगीं, जिससे उनके मटर और भी सख्त होकर उभर आए।

नीलम दीदी ने धीरे से अपने कुर्ते के बटन खोले और जैसे ही कुर्ता उतरा, उनके दूधिया तरबूज पूरी तरह मेरे सामने थे। उन पर मौजूद मटर गुलाबी और सख्त थे। मैंने अपना मुंह उन तरबूजों पर जमा दिया और उन्हें चूसने लगा, नीलम दीदी के मुंह से हल्की कराह निकलने लगी। उनकी आँखें बंद थीं और वो मेरा सिर अपने सीने से और जोर से सटा रही थीं। मेरा खीरा अब पूरी तरह से जाग चुका था और अपनी पैंट के अंदर बाहर निकलने को बेताब हो रहा था।

मैंने धीरे से उनकी सलवार नीचे सरका दी, उनकी गहरी खाई अब मेरे सामने थी। उस खाई के आसपास थोड़े बहुत बाल थे जो उसे और भी प्राकृतिक और सुंदर बना रहे थे। मैंने अपनी उंगली से खाई को सहलाया तो पाया कि वो पूरी तरह से गीली हो चुकी थी, रस वहाँ से बह रहा था। मैंने अपना चेहरा नीचे किया और उनकी खाई को चाटना शुरू कर दिया। नीलम दीदी कमर उचका कर मेरी जीभ का आनंद लेने लगीं, उनके शरीर में एक अजीब सी थिरकन पैदा हो गई थी।

उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर अपने खीरे की तरफ बढ़ाया और धीरे से मेरी पैंट की चैन खोल दी। जैसे ही मेरा खीरा बाहर आया, उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने तुरंत मेरे खीरे को अपने नाजुक हाथों में पकड़ लिया और उसे ऊपर-नीचे सहलाने लगीं। फिर उन्होंने धीरे से मेरा खीरा अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसने लगीं। उनके मुंह की गर्मी और वो गीलापन मेरे लिए बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था, मुझे लग रहा था कि अभी मेरा रस निकल जाएगा।

अब असली खुदाई का वक्त था, मैंने नीलम दीदी को बिस्तर पर लिटाया और उनके पैरों को चौड़ा किया। मैंने अपने खीरे की नोक उनकी गीली खाई के द्वार पर रखी और धीरे से धक्का दिया। नीलम दीदी ने एक लंबी आह भरी और मेरे पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। मेरा खीरा धीरे-धीरे उनकी तंग खाई के अंदर समाने लगा, वह जगह इतनी गर्म और संकरी थी कि मुझे स्वर्ग जैसा अहसास हो रहा था। मैंने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बढ़ाई और पूरी तरह से खोदा शुरू कर दिया।

नीलम दीदी के शरीर से पसीना बह रहा था और उनके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। मैंने उन्हें घुमाकर पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, पीछे से उनका नजारा और भी उत्तेजक था। उनके पिछवाड़े के दोनों मांसल हिस्से मेरे धक्कों से थरथरा रहे थे। कमरे में सिर्फ हमारे शरीरों के टकराने की आवाज और उनकी सिसकियाँ गूँज रही थीं। 'और तेज खोदो, मुझे पूरा भर दो' नीलम दीदी मदहोशी में बुदबुदा रही थीं। मैंने अपनी पूरी ताकत लगा दी और उनके अंदर गहरे तक जाने लगा।

अंत में जब हम दोनों अपनी चरम सीमा पर थे, मैंने एक आखिरी जोरदार धक्का दिया और मेरा सारा गरम रस उनकी खाई के अंदर छोड़ दिया। नीलम दीदी ने भी अपना सारा रस छोड़ दिया और बुरी तरह कांपने लगीं। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, हमारी सांसें बहुत तेज चल रही थीं और पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था। उस खुदाई के बाद जो सुकून नीलम दीदी के चेहरे पर था, वो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। हम घंटों उसी हालत में पड़े रहे, उस पल की गर्माहट को महसूस करते हुए।