सफर की मदहोश चु@@ई--->
रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे और राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी। समीर अपनी लोअर बर्थ पर बैठा हुआ था और खिड़की से बाहर अंधेरे को निहार रहा था, लेकिन उसका ध्यान बाहर कम और अपने सामने वाली बर्थ पर बैठी महिला पर ज्यादा था। उस महिला का नाम मीरा था, जिसकी उम्र लगभग 38 वर्ष रही होगी, लेकिन उसका शरीर किसी परिपक्व और रसीले फल की तरह भरा हुआ था। मीरा ने गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें से उनके शरीर की बनावट साफ़ झलक रही थी। उनके कंधे से ढलका हुआ पल्लू उनके भारी और सुडौल तरबूजों को आधा ढक पा रहा था, जिससे उनकी गहरी घाटी साफ़ नजर आ रही थी। समीर की नजरें बार-बार उन तरबूजों पर टिक जातीं, जो ट्रेन के हल्के झटकों के साथ धीरे-धीरे हिल रहे थे। मीरा के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, लेकिन उनकी आँखों में एक अनकही प्यास साफ दिखाई दे रही थी।
मीरा का शरीर काफी भरा हुआ और कामुक था; उनका पिछवाड़ा काफी चौड़ा और मांसल था, जो साड़ी के टाइट फिटिंग में और भी उभरा हुआ लग रहा था। समीर ने गौर किया कि जब मीरा अपनी जगह बदलतीं, तो उनके भारी तरबूज चोली के भीतर से बाहर आने को बेताब दिखते थे। समीर के मन में एक अजीब सी हलचल मचने लगी थी, क्योंकि इतनी रात को एक बंद केबिन में ऐसी कामुक महिला के साथ होना किसी सपने से कम नहीं था। मीरा की साड़ी कमर से थोड़ी नीचे खिसकी हुई थी, जिससे उनकी चिकनी कमर और नाभि का हिस्सा चमक रहा था। समीर ने धीरे से बातचीत शुरू की और पता चला कि मीरा अपने किसी रिश्तेदार से मिलकर वापस लौट रही हैं। उनकी आवाज़ में एक तरह की खनक और गहराई थी, जो समीर के कानों में शहद की तरह घुल रही थी। बातचीत के दौरान जब दोनों की नजरें मिलीं, तो मीरा ने अपनी पलकें झुका लीं, लेकिन उनके चेहरे पर आई हल्की लाली ने समीर को इशारा दे दिया था।
जैसे-जैसे रात गहराती गई, केबिन की लाइटें बंद कर दी गईं और सिर्फ एक मद्धम नीली रोशनी जल रही थी। समीर का दिल तेजी से धड़क रहा था और उसने हिम्मत जुटाकर मीरा के करीब बैठने का फैसला किया। उसने धीरे से अपना हाथ मीरा के हाथ पर रखा, जो साड़ी के किनारे पर रखा हुआ था। मीरा ने हाथ हटाया नहीं, बल्कि उनकी सांसें थोड़ी तेज हो गईं। समीर ने महसूस किया कि मीरा का शरीर गर्म हो रहा है और उनके मन में भी वही इच्छाएं अंगड़ाइयां ले रही हैं। समीर ने अपना हाथ मीरा की कमर पर रखा और धीरे से उन्हें अपनी ओर खींचा। मीरा ने एक गहरी आह भरी और अपना सिर समीर के कंधे पर रख दिया। इस पहले स्पर्श ने दोनों के बीच की झिझक को पूरी तरह से खत्म कर दिया था। समीर की उंगलियां अब मीरा के रेशमी ब्लाउज के नीचे जाने लगी थीं, जहाँ उसे उनके गर्म और मुलायम तरबूजों का अहसास हुआ।
समीर ने धीरे से मीरा के ब्लाउज के हुक खोले, जिससे उनके विशाल और गोरे तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गए। उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे गुलाबी मटर के दाने की तरह निप्पल उभरे हुए थे, जो ठंडक और उत्तेजना के कारण सख्त हो गए थे। समीर ने अपनी जीभ से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, जिससे मीरा के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। वह समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर उसे अपने तरबूजों पर और जोर से भींचने लगी। समीर अब रुकने वाला नहीं था, उसने धीरे से मीरा की साड़ी को पूरी तरह से उतार दिया और अब वह केवल अपने अंतःवस्त्रों में समीर के सामने थी। समीर ने उनके भारी पिछवाड़े को अपने हाथों में भरकर जोर से दबाया, जिससे मीरा की कमर धनुष की तरह मुड़ गई। पूरे केबिन में अब सिर्फ उनकी भारी सांसों और ट्रेन की गड़गड़ाहट की आवाज सुनाई दे रही थी।
समीर ने अब मीरा की नीचे की गहराई की ओर रुख किया। जैसे ही उसने मीरा की पैंटी नीचे की, उसे वहां घने काले बाल नजर आए, जो उनकी गहरी और नम खाई की रक्षा कर रहे थे। समीर ने अपनी उंगलियां उन बालों के बीच फंसाईं और धीरे से मीरा की खाई को छूना शुरू किया। वह खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां से एक मदहोश कर देने वाली खुशबू आ रही थी। समीर ने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, जिससे मीरा के बदन में बिजली सी दौड़ गई। वह अपनी उंगलियों को उस तंग खाई के भीतर और बाहर कर रहा था, और मीरा अपनी आँखें बंद किए उस सुख में डूबी हुई थी। समीर ने फिर अपना चेहरा नीचे झुकाया और अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया। मीरा ने समीर का सिर पकड़कर अपनी खाई पर और कस लिया, वह इस सुख को पूरी तरह से पीना चाहती थी।
जब उत्तेजना अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई, तो समीर ने अपने कपड़े उतार फेंके और अपना कड़क चुका खीरा बाहर निकाला। उसका खीरा अब अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ खड़ा था, जो खुदाई के लिए तैयार था। मीरा ने जब समीर के उस विशाल खीरे को देखा, तो उनकी आँखों में चमक आ गई। उन्होंने धीरे से उस खीरे को अपने हाथ में लिया और उसे सहलाने लगीं। फिर मीरा ने झुककर उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसने लगीं। समीर को ऐसा लग रहा था जैसे वह स्वर्ग में हो। मीरा का गला उस खीरे को पूरी तरह से समाने की कोशिश कर रहा था। कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद समीर ने उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटाया। अब समय आ गया था उस असली काम का जिसके लिए दोनों का शरीर तड़प रहा था।
समीर ने मीरा की टांगों को चौड़ा किया और अपने खीरे की नोक को उनकी गीली खाई के द्वार पर रखा। उसने एक धीरे से धक्का दिया और खीरा उस तंग खाई के भीतर आधा समा गया। मीरा के मुंह से एक तेज आह निकली और उन्होंने समीर की पीठ को अपने नाखूनों से खरोंच दिया। समीर ने थोड़ी और ताकत लगाई और पूरा खीरा एक ही झटके में उस गहरी खाई के अंदर समा गया। दोनों का शरीर एक-दूसरे से पूरी तरह सट गया था। समीर ने अब सामने से खोदना (मिशनरी) शुरू किया। हर धक्के के साथ मीरा के भारी तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके टकराने की आवाज 'चप-चप' करके केबिन में गूंज रही थी। समीर के धक्के अब तेज और गहरे होते जा रहे थे, और मीरा पूरी तरह से उस खुदाई का आनंद ले रही थी।
कुछ देर सामने से खोदने के बाद समीर ने मीरा को पलटने के लिए कहा। अब मीरा घुटनों के बल खड़ी हो गई थी और उनका भारी पिछवाड़ा समीर की ओर तना हुआ था। समीर ने पीछे से उनके पिछवाड़े को पकड़ा और अपने खीरे को फिर से उस तंग खाई में डाल दिया। पिछवाड़े से खोदना (डॉगगी स्टाइल) मीरा को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। समीर अब पूरी रफ़्तार से खुदाई कर रहा था, और मीरा की कराहें अब चीखों में बदल रही थीं, जिन्हें वह तकिये में दबाने की कोशिश कर रही थी। समीर का खीरा मीरा की खाई की दीवारों से बुरी तरह रगड़ खा रहा था, जिससे वहां से सफ़ेद झाग जैसा रस निकलने लगा था। समीर ने अब अपनी गति और बढ़ा दी थी, उसे महसूस हो रहा था कि अब उसका रस निकलने वाला है।
अंतिम क्षणों में समीर ने मीरा को फिर से सीधा लिटाया और अपनी पूरी ताकत के साथ अंतिम धक्के लगाने शुरू किए। मीरा का शरीर भी अब झटके ले रहा था, क्योंकि उनकी खाई से भी रस छूटने वाला था। जैसे ही समीर ने एक आखिरी जोरदार धक्का लगाया, उसका सारा गर्म रस मीरा की गहरी खाई के भीतर छलक गया। उसी समय मीरा का भी रस निकल गया और वह समीर को कसकर लिपट गई। दोनों के शरीर पसीने से तरबतर थे और सांसें अभी भी तेज चल रही थीं। केबिन में एक अजीब सी संतुष्टि भरी खामोशी छा गई थी। समीर ने धीरे से अपना खीरा बाहर निकाला और मीरा के पास ही लेट गया। मीरा ने समीर के माथे को चूमा और उसके सीने पर सिर रखकर सो गई। उस रात के सफर ने दो अजनबियों को एक ऐसे बंधन में बांध दिया था, जिसे वे कभी नहीं भूल सकते थे।